शिमला। हिमाचल प्रदेश में केंद्र से मिलने वाली रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट ;आरडीजीद्ध को लेकर सियासत तेज हो गई है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने इस मुद्दे पर भाजपा को सीधे निशाने पर लेते हुए तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने इसे प्रदेश के अस्तित्व की लड़ाई करार दिया है। विक्रमादित्य सिंह ने सोशल मीडिया के माध्यम से विपक्ष को घेरते हुए कहा कि जो भाजपा कल तक आरडीजी को हिमाचल के लिए संजीवनी बताती थी, आज उसी मुद्दे पर खामोशी क्यों साधे हुए है।
तब समर्थन, अब सन्नाटा क्यों?
विक्रमादित्य सिंह ने पुराने वित्तीय आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जब प्रदेश को 11,431 करोड़ रुपये की ग्रांट मिली थी, उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी। बावजूद इसके कांग्रेस ने प्रदेश हित को प्राथमिकता देते हुए सरकार का समर्थन किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि आज जब ग्रांट के बंद होने या कटौती की चर्चा है, तो भाजपा की ओर से वैसी मुखर आवाज क्यों नहीं सुनाई दे रही। मंत्री ने इसे राजनीतिक दृष्टिकोण का बदलाव बताते हुए कहा कि विपक्ष को सत्ता और विपक्ष की सीमाओं से ऊपर उठकर प्रदेश के व्यापक हित में सोचना चाहिए।
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पहाड़ी राज्य की मजबूरी और केंद्र पर निर्भरता
विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि हिमाचल एक पहाड़ी राज्य है, जहां भौगोलिक परिस्थितियां विकास और राजस्व सृजन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने याद दिलाया कि स्वयं भाजपा के नेता भी पहले इन परिस्थितियों को स्वीकार करते रहे हैं और आरडीजी की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
राजनीतिक चश्मा उतारें भाजपा
लोक निर्माण मंत्री ने भाजपा को नसीहत देते हुए कहा कि अब समय राजनीतिक चश्मा उतारने का है। यह मुद्दा किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की वित्तीय स्थिरता और भविष्य से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यदि ग्रांट पहले प्रदेश की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी थी, तो आज उस पर सवाल उठाने या चुप्पी साधने का क्या औचित्य है।
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विपक्ष पर अवसरवादिता का आरोप
विक्रमादित्य सिंह ने विपक्ष के मौजूदा रुख को ‘राजनीतिक अवसरवादिता’ करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के हित से जुड़े इतने गंभीर विषय पर एकजुटता दिखाने के बजाय यदि दलगत राजनीति हावी होगी, तो इससे जनता को नुकसान होगा। उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से आह्वान किया कि आरडीजी के मुद्दे पर केंद्र के समक्ष एकजुट आवाज उठाई जाए और हिमाचल के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
आरडीजी को लेकर शुरू हुई यह बहस अब केवल आर्थिक मसला नहीं रह गई है, बल्कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि विपक्ष इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या प्रदेश हित के मुद्दे पर सियासी मतभेदों से ऊपर उठकर कोई साझा रणनीति बन पाती है।
