शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा बजट सत्र चल रहा है। आज सत्र का दूसरा दिन है, मगर पहले ही दिन बजट सत्र में राजनीतिक टकराव देखने को मिल गया। एक ओर गवर्नर ने अपने अभिभाषण को महज दो मिनकट में समेटकर संकेत दे दिया, वहीं दूसरी ओर सरकार ने उनकी आपत्तियों के बावजूद दो महत्वपूर्ण विधयकों को मिना किसी संशोधन के दोबारा पारित कर दिया है। इस कदम को सत्ता और राजभवन के बीच बढ़ती खींचतान के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने बजट सत्र के माहौल को पहले ही दिन गरमा दिया था।
राज्यपाल की आपत्तियों के बावजूद विधानसभा का फैसला
हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) संशोधन विधेयक और हिमाचल प्रदेश नगर निगम संशोधन विधेयक को बिना किसी बदलाव के फिर से पास कर दिया। ये दोनों विधेयक पहले ही विंटर सेशन में पारित हो चुके थे, लेकिन राज्यपाल ने कुछ आपत्तियों के साथ इन्हें पुनर्विचार के लिए लौटाया था। इसके बावजूद सरकार ने इन्हें मूल स्वरूप में ही सदन से पारित करा लिया।
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RERA में अध्यक्ष चयन प्रक्रिया को लेकर बदलाव
रियल एस्टेट संशोधन विधेयक के तहत रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति के प्रमुख को बदलने का प्रस्ताव है। नए प्रावधान के अनुसार इस समिति की अध्यक्षता अब मुख्य सचिव करेंगे, जबकि पहले यह जिम्मेदारी हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास थी। इस बदलाव को लेकर पहले ही सवाल उठाए जा चुके हैं, लेकिन सरकार अपने रुख पर कायम रही।
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नगर निगम विधेयक में मेयर-डिप्टी मेयर का कार्यकाल बढ़ा
दूसरे विधेयक के तहत नगर निगमों में महापौर और उपमहापौर का कार्यकाल ढाई साल से बढ़ाकर पांच साल करने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक भी पहले अध्यादेश के रूप में लाया गया था, जिसे बाद में कानून का रूप देने के लिए विधानसभा में पेश किया गया। राज्यपाल की आपत्तियों के बावजूद सदन ने इसे भी बिना संशोधन के दोबारा पारित कर दिया।
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वॉइस वोट से पास हुए दोनों विधेयक
दोनों विधेयकों को विधानसभा में वॉइस वोट के जरिए पारित किया गया। विपक्ष ने इन प्रस्तावों पर सवाल उठाए, लेकिन संख्याबल के दम पर सरकार ने इन्हें मंजूरी दिला दी। सरकार का तर्क है कि ये संशोधन प्रशासनिक स्थिरता और सुचारू संचालन के लिए जरूरी हैं।
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बजट सत्र की शुरुआत में ही सियासी संदेश
गौरतलब है कि बजट सत्र के पहले ही दिन राज्यपाल का अभिभाषण बेहद संक्षिप्त रहा। इसके तुरंत बाद सरकार द्वारा इन विधेयकों को फिर से पारित कराना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सदन के भीतर और बाहर राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है।
अब राज्यपाल के पास बचे हैं केवल दो विकल्प
राज्यपाल की स्वीकृति के बिना विधेयक संवैधानिक रूप से प्रभावी नहीं माना जाता। हालांकि संविधान यह भी कहता है कि राज्यपाल बिना ठोस कारण के किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार के पास सर्वोच्च न्यायालय जाने का विकल्प होता है। यदि विधानसभा किसी विधेयक को दोबारा पारित कर राज्यपाल को भेजती है, तो सामान्यतः राज्यपाल को उस पर सहमति देनी होती है। वहीं, यदि विधेयक के केंद्रीय कानून से टकराने की आशंका हो, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।
