शिमला। सुक्खू सरकार के मुताबिक हिमाचल प्रदेश इस समय गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। हालांकि एक तरफ सरकार के पास कर्मचारियों को DA देने और पेंशनरों का एरियर चुकाने के पैसे नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के 'कृषि उपज विपणन समिति' (APMC) के चेयरमैनों के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर लग्जरी गाड़ियां खरीदी जा रही हैं। ये विरोधाभास तब और भी हैरान करने वाला है जब खुद वित्त विभाग सरकार को खजाना बचाने के लिए कड़े कदम उठाने की सलाह दे रहा है।

24 लाख की स्कॉर्पियो-N

ताजा जानकारी के अनुसार, मार्केटिंग बोर्ड ने 9 नई लग्जरी गाड़ियों का ऑर्डर दिया है। इनमें से तीन जिलों के चेयरमैनों को टॉप मॉडल स्कॉर्पियो-N 4×4 सौंपी जा चुकी है, जिसकी ऑन-रोड कीमत करीब 22 से 24 लाख रुपये है। शेष 6 जिलों के लिए भी गाड़ियां जल्द ही पहुंचने वाली हैं। इन गाड़ियों की खरीद के लिए 50 फीसदी बजट सीधे राज्य सरकार ने दिया है जबकि बाकी पैसा मार्केटिंग बोर्ड और APMC ने अपने फंड से खर्च किया है।

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किसान के पैसे का इस्तेमाल

सबसे बड़ा सवाल ये है कि APMC के पास आने वाला पैसा वास्तव में किसानों और बागवानों की गाढ़ी कमाई है। नियमों के अनुसार, मार्केट फीस से इकट्ठा हुए इस बजट का इस्तेमाल नई अनाज मंडियों के निर्माण और सब्जी उत्पादक क्षेत्रों में संपर्क सड़कें बनाने के लिए होना चाहिए लेकिन बुनियादी ढांचे को सुधारने के बजाय इस पैसे से नेताओं के लिए महंगी गाड़ियां खरीदी जा रही हैं।

पात्रता ना होने पर भी ठाठ

नियमों की मानें तो APMC चेयरमैन सरकारी गाड़ी रखने के हकदार ही नहीं हैं। उन्हें केवल सरकारी बैठकों या मंडियों के निरीक्षण के लिए गाड़ी मिल सकती है जिसके बदले उन्हें यात्रा भत्ता दिया जाता है लेकिन हिमाचल में हकीकत इसके उलट है। चेयरमैन इन गाड़ियों का उपयोग निजी कार्यों के लिए कर रहे हैं और घर से दफ्तर आने-जाने के लिए भी सरकारी पेट्रोल फूंका जा रहा है।

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इतना ही नहीं, जब चेयरमैन सरकारी गाड़ी पर कब्जा कर लेते हैं, तो विभाग के सचिव काम के लिए अलग से टैक्सियां हायर करते हैं। शिमला APMC जैसे उदाहरण सामने आए हैं जहां पहले केवल सेब सीजन में टैक्सी ली जाती थी लेकिन अब पूरे साल टैक्सियों पर हजारों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

सरकार में 'तालमेल' की कमी

इस खरीद को लेकर सरकार के भीतर भी असमंजस की स्थिति है। कृषि सचिव सी. पालरासू  के मुताबिक सरकार ने ही इन गाड़ियों को खरीदने की अनुमति दी है लेकिन कृषि मंत्री चंद्र कुमार इस बात से हैरान हैं व उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है। वहीं मार्केटिंग बोर्ड के नए चेयरमैन कुलदीप सिंह पठानिया ने इसे अपनी नियुक्ति से पहले का फैसला बताया है।

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एक तरफ आम जनता से सब्सिडी छोड़ने और कर्मचारियों से हक की लड़ाई ना लड़ने की अपील की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक नियुक्तियों को खुश करने के लिए लग्जरी गाड़ियां बांटी जा रही हैं। सरकार की ये 'दोहरी नीति' जनता और कर्मचारियों में कई सवाल पैदा करती है।