शिमला। हिमाचल प्रदेश में वित्तीय वर्ष 2025-26 की शुरुआत के साथ ही मनरेगा के तहत बड़ी संख्या में अधूरे कार्य सामने आए हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में कई बड़े खुलासे हुए हैं।

मनेरगा के काम पेंडिंग

रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 1,71,841 स्पिलओवर कार्य ऐसे हैं- जिन्हें पिछले वित्तीय वर्षों में स्वीकृति तो मिली, लेकिन विभिन्न कारणों से समय पर पूरा नहीं किया जा सका। अब इन्हीं कार्यों को चालू वित्तीय वर्ष में आगे बढ़ाया जा रहा है।

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पिछले साल से अटके हैं काम

स्पिलओवर कार्यों की इतनी बड़ी संख्या यह संकेत देती है कि मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन में गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय बाधाएं बनी हुई हैं, जिनका सीधा असर ग्रामीण रोजगार, आधारभूत ढांचे और किसानों से जुड़े विकास कार्यों पर पड़ रहा है।

छोटे किसानों की जमीन से जुड़े हैं काम

रिपोर्ट के अनुसार, स्पिलओवर कार्यों में सबसे अधिक संख्या व्यक्तिगत भूमि पर किए जाने वाले कार्यों की है। ऐसे कार्यों की संख्या 1,46,653 तक पहुंच गई है। ये वे कार्य हैं, जो मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों की जमीन से जुड़े होते हैं। जिनका उद्देश्य उनकी आय बढ़ाना और भूमि की उत्पादकता सुधारना होता है।

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बुनियादी ढांचे से जुड़े काम अधूरे

इसके अलावा ये सब कार्य भी स्पिलओवर सूची में शामिल हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि जल, सड़क और भूमि सुधार जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े कई अहम कार्य वर्षों से अधूरे पड़े हैं।

  • ग्रामीण संपर्क मार्गों से जुड़े 11,110 कार्य
  • भूमि विकास के 3,336 कार्य
  • जल संरक्षण एवं जल संचयन के 2,651 कार्य
  • पारंपरिक जल स्रोतों के जीर्णोद्धार से जुड़े 295 कार्य
  • बाढ़ नियंत्रण एवं संरक्षण के 4,305 कार्य

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सभी जिलों में अधूरे काम

जिला-वार स्थिति देखें तो मंडी जिला स्पिलओवर कार्यों की संख्या में सबसे आगे है, जहां 34,698 कार्य अधूरे हैं। इसके बाद-

  • चंबा में 26,863
  • कांगड़ा में 26,155
  • शिमला में 19,211
  • कुल्लू में 17,299

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वहीं, जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में भी 378 स्पिलओवर कार्य सामने आए हैं। राज्य के सभी 12 जिलों में किसी न किसी श्रेणी में अधूरे मनरेगा कार्य मौजूद हैं, जो यह दर्शाता है कि समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

पंचायत स्तर पर रुके विकास कार्य

स्पिलओवर कार्यों का सबसे ज्यादा असर पंचायत स्तर पर दिखाई दे रहा है। कई पंचायतों में वर्षों पहले शुरू किए गए कार्य आज भी अधूरे पड़े हैं। इससे न केवल ग्रामीणों को रोजगार के अवसर नहीं मिल पा रहे, बल्कि सिंचाई, रास्तों और जल संरक्षण से जुड़े लाभ भी लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कई स्थानों पर अधूरे ढांचे ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं।

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भुगतान में देरी को बताया मुख्य कारण

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि मनरेगा के तहत बड़ी संख्या में कार्यों के स्पिलओवर होने का प्रमुख कारण केंद्र सरकार की ओर से मजदूरी और सामग्री मद की राशि समय पर जारी न होना है। उन्होंने कहा कि भुगतान रुकने की स्थिति में पंचायतें न तो मजदूरों को मजदूरी दे पा रही हैं और न ही निर्माण सामग्री का भुगतान कर पा रही हैं, जिससे कार्य बीच में ही ठप हो जाते हैं।

ट्रांसजेंडर पंजीकरण पर जांच शुरू

इसी रिपोर्ट में मनरेगा के तहत ट्रांसजेंडर पंजीकरण को लेकर सामने आई विसंगतियों ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण विकास विभाग ने इस मामले में विभागीय जांच शुरू कर दी है। मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि आंकड़ों की सही सीडिंग सुनिश्चित की जाए और जल्द विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाए।

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मनरेगा में कितने ट्रांसजेंडर पंजीकृत

केंद्रीय मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में मनरेगा के तहत कुल 131 ट्रांसजेंडर पंजीकृत बताए गए हैं। इन आंकड़ों की सत्यता को लेकर अब विभागीय स्तर पर छानबीन की जा रही है। जिला-वार आंकड़ों में-

  • मंडी से 31
  • शिमला से 24
  • कांगड़ा से 18
  • चंबा से 15
  • सिरमौर से 14
  • सोलन से 10
  • बिलासपुर से 6
  • हमीरपुर से 5
  • ऊना से 4
  • किन्नौर से 2
  • कुल्लू से 2

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655 पंचायतों में एक भी दिन का काम नहीं

मनरेगा की जमीनी स्थिति को लेकर एक और चौंकाने वाला खुलासा यह है कि प्रदेश की 655 ग्राम पंचायतों में दिसंबर महीने के दौरान मनरेगा के तहत एक भी व्यक्ति को काम नहीं मिला। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की कुल 3616 ग्राम पंचायतों में से 655 पंचायतों में एक भी कार्यदिवस का सृजन नहीं हुआ।

 

इतना ही नहीं, 77 ग्राम पंचायतें ऐसी रहीं, जहां मनरेगा के तहत कोई भी बजट खर्च नहीं किया गया। कार्यदिवस सृजित करने के मामले में शिमला जिला सबसे पीछे रहा, जहां 149 पंचायतें पूरी तरह फिसड्डी साबित हुईं। पिछले छह महीनों में प्रदेश की एक हजार से अधिक पंचायतें मनरेगा के तहत रोजगार सृजन करने में नाकाम रही हैं।

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ग्रामीण रोजगार पर मंडराता संकट

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मनरेगा, जो ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार की जीवनरेखा मानी जाती है, वह हिमाचल प्रदेश में गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। भुगतान में देरी, प्रशासनिक ढिलाई और अधूरे कार्यों की भरमार ने योजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सीधा नुकसान ग्रामीण मजदूरों, किसानों और गांवों के विकास को उठाना पड़ सकता है।

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