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February 7, 2026

आंखों की रोशनी नहीं बनी बाधा- वकालत पढ़कर सबको चौंकाया- ये हैं दृष्टिबाधित वकील लग्नेश कुमार

2009 में चली गई आंखों की रोशनी, लेकिन नहीं टूटा हौसला

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बिलासपुर। कहते हैं कि हालात चाहे जितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इंसान के हौसले मजबूत हों तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के लग्नेश कुमार ने इस बात को सच कर दिखाया है। वे प्रदेश के पहले ऐसे 100 प्रतिशत नेत्रहीन वकील हैं, जो वर्तमान में घुमारवीं सिविल कोर्ट में लगातार वकालत कर रहे हैं।

2009 में चली गई आंखों की रोशनी, लेकिन नहीं टूटा हौसला

बता दें कि बिलासपुर जिला के घुमारवीं उपमंडल के बरोटा गांव निवासी लग्नेश कुमार ने अपने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर हिमाचल के न्यायिक इतिहास में एक नई मिसाल कायम की है। इस मुकाम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। लग्नेश कुमार बताते हैं कि वर्ष 2009 में आंखों में गंभीर संक्रमण के चलते उनकी आंखों की रोशनी चली गई। शुरुआत में आंखें लाल रहने लगीं और स्थानीय स्तर पर इलाज करवाया गया, जहां इसे एलर्जी बताया गया।

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बाद में शिमला सहित कई स्थानों पर जांच करवाई गई, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी आंखों की रोशनी नहीं बच सकी और वे पूरी तरह दृष्टिबाधित हो गए। उस समय जिंदगी ने जैसे एकाएक अंधेरा ओढ़ लिया, लेकिन लग्नेश ने हार मानने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

सीमित संसाधन, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं

वर्तमान में 33 वर्षीय लग्नेश कुमार के पिता का पहले ही निधन हो चुका है। उनकी माता एक आंगनबाड़ी केंद्र में हेल्पर के रूप में कार्यरत हैं। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मां ने बेटे का हौसला कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। परिवार के सहयोग और अपने मजबूत इरादों के सहारे लग्नेश ने पढ़ाई को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।

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पढ़ाई से कानून तक का सफर

लग्नेश कुमार ने वर्ष 2016 में घुमारवीं कॉलेज से इंग्लिश और पॉलिटिकल साइंस विषयों के साथ ग्रेजुएशन पूरी की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर से 2016 से 2020 तक कानून (LLB) की पढ़ाई की। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वापस अपने क्षेत्र लौटे और पिछले दो वर्षों से घुमारवीं सिविल कोर्ट में वकालत कर रहे हैं।

तकनीक और आत्मविश्वास बने ताकत

दृष्टिबाधित होने के बावजूद लग्नेश कुमार आज तकनीक, ब्रेल लिपि और सहायक उपकरणों की मदद से केस की तैयारी करते हैं। वे पूरे आत्मविश्वास के साथ अदालत में अपनी बात रखते हैं और कानून की बारीकियों को मजबूती से पेश करते हैं। उनकी कार्यशैली यह साबित करती है कि शारीरिक अक्षमता कभी भी काबिलियत की सीमा तय नहीं कर सकती।

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युवाओं और दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा

लग्नेश कुमार की यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज के लिए एक मजबूत संदेश है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, शिक्षा का सहारा हो और खुद पर विश्वास हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। आज लग्नेश कुमार न केवल दिव्यांगजनों, बल्कि हर उस युवा के लिए प्रेरणा बन चुके हैं, जो परिस्थितियों से लड़कर अपने सपनों को सच करना चाहता है।

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