शिमला। पहाड़ी राज्य हिमाचल की शान कही जाने वाली पहाड़ी गाय धीरे धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने लगी है। पहाड़ी गाय हिमाचल से संदिग्ध परिस्थितियों मंे गायब हो रही है। पिछले सात साल की बात करें तो करीब 4 लाख 6 हजार 249 गाय गायब हो गई हैं। गायब हुई गायों की मौत हुई है, या फिर कोई और कारण यह है, इसका अभी तक खुलासा नहीं हो पाया है।
कितनी गायों की हुई मौत, विभाग के पास नहीं है आंकडे
दरअसल पशुपालन विभाग के पास ऐसा कोई आंकड़ा ही नहीं है, जिससे पहाड़ी गायों की स्टीक जानकारी का पता चल सके। 2012 से लेकर 2019 तक कितनी पहाड़ी गायों की मौत हुई है, इसका भी विभाग के पास कोई आंकड़ा नहीं है। ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिरकार इतनी बड़ी संख्या में पहाड़ी गायों के गायब होने का कारण क्या है और यह गाय कहां गायब हुई हैं।
2019 के बाद अब 2024 में होगी पशु गणना
बता दें कि हिमाचल में पशु गणना 2019 में हुई थी। उसके बाद अब सितंबर 2024 में पशु गणना की जा रही है। ऐसे में यह पता लगा पाना मुश्किल है कि इस बीच कितनी गायों की मौत हुई है और कितनी अन्य कारणों से गायब हुई हैं। माना जा रहा है कि पशु गणना खत्म होने के बाद सात साल में लापता हुई गायों की संख्या का आंकड़ा और भी बढ़ सकता है।
2019 में थी 10 लाख से अधिक गाय
2019 की पशुगणना के अनुसार हिमाचल में इनकी संख्या 10 लाख 6 8 हजार 935 थी। लेकिन अब पहाड़ी गायों की संख्या 34 फीसदी घटकर 7 लाख 59 हजार 82 रह गई है।
लगातार पहाड़ी गाय की घटती संख्या चिंता का विषय है। पशु चिकित्सक की मानें तो एक पहाड़ी गाय की औसतन उम्र 15 से 20 साल की होती है। लेकिन हिमाचल में कितनी गायों की मौत अपनी औसतन उम्र के हिसाब से हुई है, इसका कोई आंकड़ा ना होने से भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
प्रदेश भर में बनाए गए हैं 245 गोसदन
हिमाचल में गायों की देखभाल के लिए सरकार ने गौशालाओं के निर्माण करवाए हैं। मौजूदा आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो तो प्रदेशभर में 245 गोसदन हैं। इनमें 20 हजार 797 गाय हैं। लंपी रोग से करीब ग्यारह हजार गायों की मौत हुई है। गोशाला में 2021 में 6 हजार 778 गायों को पनाह दी है। इसी तरह से साल 2022-23 में 11 हजार 989 गायों को पनाह दी है। साल 2023-24 में 12 हजार 447 गाय को गौशाला में रखा गया है।
पहाड़ी गायों के दूध और घी के फ़ायदे
- पहाड़ी गायों के दूध में A2 बीटा-केसीन प्रोटीन होता है, जो हृदय रोग, मधुमेह, और मानसिक रोगों से लड़ने में मदद करता है।
- पहाड़ी गाय के घी में विटामिन A2, E, और D, ओमेगा, और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व होते हैं। यह घी कई तरह से फ़ायदेमंद है, जैसे कि
- यह उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है।
- यह गैस्ट्रिक समस्याओं का इलाज करता है।
- यह टूटी हड्डियों का इलाज करता है।
- यह जोड़ों की मालिश के लिए अच्छा होता है।
- यह मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिए अच्छा होता है।
- यह अस्थमा, सिरदर्द जैसी बीमारियों को रोकने में मदद करता है।
- यह अनिद्रा को ठीक करने में मदद करता है।
- पहाड़ों पर चरने वाली गायों का गोमूत्र आयुर्वेद के मुताबिक ज़्यादा फ़ायदेमंद माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये गायें हरी घास और औषधियों का सेवन करती हैं।
क्या कहते हैं पशुपालन विभाग के निदेशक
पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ प्रदीप शर्मा ने कहा कि कितनी गायों की प्राकृतिक मौत हुई हैं, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं रहता। विभाग के पास केवल यह आंकड़ा है कि प्रदेश में मौजूदा समय में इतनी गाय मौजूद हैं। यह संख्या बीमारी या उम्र पूरी होने की वजह से भी कम हो सकती है।
क्या कहते हैं पशु चिकित्सा अधिकारी
डॉ तरुण ठाकुर ने कहा कि एक पहाड़ी और जर्सी गाय की औसतन उम्र 15 से 20 साल होती है। संख्या कम होने की कई वजह हो सकती हैं।
पहाड़ी गाय के क्या हैं फायदे
पहाड़ी नस्ल की गाय के दूध में ए.2 बीटा प्रोटीन ज्यादा मात्रा में पाया जाता है और यह सेहत के लिए काफी अच्छा है। ए.2 बीटा प्रोटीन हृदय की बीमारी, मधुमेह और मानसिक रोग के खिलाफ सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह शक्तिदायक और आसानी से पचने वाला होता है।
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ये भी है खासियत
ये नस्ल अपने बेहतरीन गुणों के कारण अलग महत्त्व रखती है। इसके दूध में न केवल औषधीय गुण हैं, बल्कि गोमूत्र भी खेती के लिए लाभदायक है। पहाड़ी गाय अन्य नस्लों से कई तरह से भिन्न है। इसका कद दूसरी गायों से काफी छोटा है। इन्हें ज्यादा पानी पिलाने या फीड की जरूरत नहीं पड़ती। दूसरी गायों की तुलना में इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी ज्यादा है।
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पहाड़ी नस्ल की सुधार पर भी किया गया काम
साल 2023 में पहाड़ी गाय की नस्ल में सुधार पर सरकार ने काम शुरू किया था। ब्रीड नस्ल को गौरी नाम दिया गया था। इनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए सिरमौर जिले के बागथन गांव में 4.64 करोड़ रुपये की लागत से 137.17 बीघा जमीन पर जल्द प्रोजेक्ट को मंजूरी प्रदान की गई थी। जिसका प्रस्तावित बजट निदेशालय स्तर पर मंजूर हुआ था।
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पहाड़ी गाय के कम होने का यह कारण भी हैं अहम
असल में एक पहाड़ी गाय कम दूध देती है। जबकि अन्य नस्लों की जैसे जर्सी, साहिवाल सहित कुछ ऐसी भी नस्लें हैं जो काफी ज्यादा दूध देती हैं। अधिक दूध के लालच में भी लोगों का रुझाान पहाड़ी गाय को छोड़ कर अन्य नस्लों की गायों की तरफ बढ़ रहा है। हिमाचल में ज्यादातर लोग दूध बेच कर अपनी आर्थिकी मजबूत करत हैं। जिसके लिए वह अधिक दूध देने वाली नस्लों को अपनाते हैं।
पशु तस्करी भी एक बड़ा कारण
हिमाचल में पिछले कुछ सालों से बहुत अधिक संख्या में पशुओं की तस्करी हो रही है। प्रदेश में आए दिन खबरें सामने आती रहती हैं कि पशु तस्करी करते हुए लोग पकड़े गए हैं। पहाड़ी नस्ल की गाय का कम होने के पीछे एक बड़ा कारण पशु तस्करी को भी माना जा रहा है। पशु तस्कर यहां से पशुओं को ले जाते हैं और बाहरी राज्यों की मंडियों में बेच देते हैं।