शिमला। हिमाचल प्रदेश में कई ऐसी अनोखी वस्तुएं बनती है या प्राकृतिक तौर पर हमें मिली है जो शायद ही कहीं मिले। जैसे कि कांगड़ा चाय, चंबा रुमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, हिमाचली काला जीरा आदि। इन सभी की अपनी अलग पहचान होने के कारण इन सभी चीजों के GI टैग दिया गया है।
कांगड़ा चाय को मिला था पहला GI टैग
हिमाचल प्रदेश में सबसे पहले जिला कांगड़ा की चाय को GI टैग दिया गया था। साल 2005 में दिए इस टैग के बाद जिला कुल्लू के शॉल का नंबर आया और ये बना प्रदेश का दूसरे नंबर पर GI टैग वाला प्रोडक्ट । इसके अलावा अब तक प्रदेश के लगभग 20 से अधिक वस्तुओं को GI टैग दिया जा चुका है।
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कांगड़ा चाय, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा घाटी से आती है, कई खासियतों के लिए प्रसिद्ध है:
1. स्वाद और सुगंध:
कांगड़ा चाय में एक अद्वितीय सुगंध और हल्का, मीठा स्वाद होता है। यह इसकी विशेष भौगोलिक स्थिति और जलवायु का परिणाम है।
2. स्वास्थ्य लाभ:
यह चाय एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होती है, जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। यह हृदय स्वास्थ्य में सुधार और वजन प्रबंधन में मदद कर सकती है।
3. अलग-अलग प्रकार:
कांगड़ा चाय विभिन्न प्रकारों में उपलब्ध है, जैसे कांगड़ा काली चाय, कांगड़ा हरी चाय, और कांगड़ा ऊलोंग चाय, जो हर किसी के स्वाद के लिए कुछ न कुछ पेश करती है।
4. पारंपरिक उत्पादन विधि:
कांगड़ा चाय का उत्पादन पारंपरिक तरीकों से किया जाता है, जिससे इसकी गुणवत्ता और स्वाद में वृद्धि होती है। इसे हाथ से तोड़ा जाता है और प्राकृतिक तरीकों से प्रोसेस किया जाता है।
5. भौगोलिक विशेषता:
कांगड़ा घाटी की मिट्टी और जलवायु चाय की विशेषता को और बढ़ाते हैं। यहाँ की उच्च ऊँचाई और आद्रता चाय की पत्तियों को एक खास स्वाद और सुगंध प्रदान करती है।
6. सामाजिक और आर्थिक महत्व:
कांगड़ा चाय स्थानीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण आय स्रोत है और यह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में योगदान करती है।
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कुल मिलाकर, कांगड़ा चाय न केवल अपने स्वाद के लिए बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ और पारंपरिक उत्पादन के लिए भी बेहद लोकप्रिय है।
हिमाचल प्रदेश में कई उत्पादों और वस्तुओं को GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग प्राप्त हुआ है। GI टैग उन उत्पादों को दिया जाता है जो विशेष भौगोलिक क्षेत्र से आते हैं और जिनकी गुणवत्ता, नाम या प्रतिष्ठा उस क्षेत्र से जुड़ी होती है।
हिमाचल प्रदेश के कुछ प्रमुख जीआई टैग प्राप्त उत्पाद:
कुल्लू शॉल: ये शॉल अपनी गुणवत्ता और डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध हैं।
हिमाचली सेब: हिमाचल प्रदेश का सेब विशेष रूप से इसके स्वाद और गुणवत्ता के लिए जाना जाता है।
चंबा रुमाल: यह कढ़ाई से बना एक पारंपरिक कपड़ा है।
मंडी का किन्नू: यह विशेष प्रकार का संतरा है जो अपनी मिठास के लिए प्रसिद्ध है।
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इसके अलावा इन्हें भी मिल चुका है GI टैग
- किन्नौरी शॉल
- कांगड़ा पेंटिंग
- हिमाचली काला जीरा
- चुल्ली तेल
- चंबा चप्पल
- लाहौली मोजे और दस्ताने
- सेपू बड़ी
- हिमाचली संगीत वाद्ययंत्र
- किन्नौरी सेब
- सिरमौरी लोइया
- चंबा धातु शिल्प
- किन्नौरी आभूषण
- भरमौर राजमा
- पांगी की थांगी
- चंबा चुख
- लाल चावल
- दसांगरू
जीआई टैग कैसे मिलता है:
आवेदन प्रक्रिया: जीआई टैग के लिए आवेदन करने के लिए सबसे पहले एक विशेष समिति या समूह को बनाना होता है, जिसमें उत्पाद के निर्माता शामिल होते हैं।
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दस्तावेज़ीकरण: उत्पाद के विशेष गुणों, उसके उत्पादन की विधि, भौगोलिक क्षेत्र की पहचान आदि का विस्तृत दस्तावेज तैयार करना होता है।
साक्षात्कार और मूल्यांकन: जीआई रजिस्ट्रार द्वारा उत्पाद के गुणों और भौगोलिक क्षेत्र का मूल्यांकन किया जाता है।
फैसला: यदि सभी मानदंडों को पूरा किया गया हो, तो जीआई टैग दिया जाता है।
पंजीकरण: अंत में, उत्पाद को जीआई रजिस्टर में दर्ज किया जाता है।