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October 20, 2026

हिमाचल के इस गांव में पहले बंदू*क से फोड़ते हैं पाप का घड़ा, फिर होता है रावण दहन

चार KM पैदल चलकर बातल पहुंचती है भगवान की पालकी

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Batal Dussehra solan news

सोलन। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में एक ऐसा दशहरा मनाया जाता है, जिसकी परंपरा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग है। यहां रावण दहन से पहले बंदूक से ‘पाप के घड़े’ को निशाना लगाकर फोड़ा जाता है। मान्यता है कि यह रस्म बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। बातल गांव में करीब 600 साल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी राजपरिवार निभा रहा है। आखिर क्या है इस अनोखे दशहरे का इतिहास और कैसे शुरू हुई यह परंपरा? आइए जानते हैं।

चार KM पैदल चलकर बातल पहुंचती है भगवान की पालकी

दशहरे के दिन अर्की बाजार में स्थित भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर से ठाकुर जी की पालकी सजाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। यह पालकी अर्की बाजार से गाहर होते हुए करीब चार किलोमीटर लंबे जंगल के रास्ते बातल गांव पहुंचती है। गांव पहुंचने पर स्थानीय लोग पालकी का स्वागत करते हैं। इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है और दशहरे से जुड़ी पुरानी परंपराएं निभाई जाती हैं।

 

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राजपरिवार आज भी बंदूक से लगाता है ‘पाप के घड़े’ पर निशाना

बातल की पंचायत प्रधान उर्मिला शर्मा के अनुसार, पुराने समय में यहां रावण दहन के बजाय बंदूक से घड़े को निशाना बनाकर फोड़ने की परंपरा थी। इस घड़े को पाप का घड़ा माना जाता है। इसे फोड़ना बुराई और असत्य के अंत का प्रतीक है।

 

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आज भी राजपरिवार के सदस्य बंदूक से घड़े पर निशाना लगाकर इस परंपरा को निभाते हैं। इसके बाद मेले में आए दूसरे लोग भी निशाना लगाते हैं। आखिर में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यही परंपरा बातल के दशहरे को दूसरे स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरे से अलग बनाती है।

दिन में खेल प्रतियोगिताएं, रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम

बातल में दो दिन तक मेला लगता है। दिन के समय यहां अलग-अलग खेल प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं, जबकि शाम और रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इनमें स्थानीय कलाकारों के साथ दूसरे राज्यों से आए कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियां देते हैं।

 

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इस मेले में गजल गायक चंदन दास, अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन जैसे मशहूर कलाकार प्रस्तुति दे चुके हैं। इसके अलावा प्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण भी यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं। वह पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायण से जुड़ी अपनी पारिवारिक पहचान के लिए भी जानी जाती हैं।

स्थानीय लोगों का दावा, बातल से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा

स्थानीय निवासी शांति स्वरूप के अनुसार, इस क्षेत्र में रावण दहन की शुरुआत सबसे पहले बातल गांव से हुई थी। बाद में दूसरे स्थानों पर भी यह परंपरा शुरू हो गई। आज भी बातल का दशहरा अपनी पुरानी मान्यताओं, राजपरिवार से जुड़ी रस्मों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण खास पहचान रखता है।

 

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करीब छह सदियों से चली आ रही परंपराओं को आज भी निभाया जा रहा है, जो इस मेले को हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक और पारंपरिक आयोजनों में एक खास स्थान दिलाती हैं।

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