#धर्म
November 1, 2025
हिमाचल: ये पवित्र घास सिर्फ पूजा का प्रतीक नहीं, सेहत की भी है पेहरेदार
मानसिक व शारीरिक पवित्रता करती है घास
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शिमला। हिमाचल में जब भी पूजा की थाली सजती है तो उसमें एक अहम सामग्री होती है एक ऐसी घास जो विशेष प्रकार की होती है। हमारे बुजुर्ग बड़े श्रद्धा से कहते हैं कुशा और कुछ इलाकों में इसे द्रुवा कहा जाता है मगर क्या आप जानते हैं कि ये घास सिर्फ पूजा का प्रतीक नहीं बल्कि हमारे शरीर की सेहत की भी पहरेदार है।
कुश या कुशा- हमारे पहाड़ों में उगने वाली ये घास धार्मिक आस्था, आयुर्वेद और विज्ञान- तीनों का संगम है। वेदों में इसे पवित्र घास कहा गया है और कहा जाता है कि भगवान विष्णु के वराह अवतार के शरीर से इसका जन्म हुआ था इसीलिए बिना कुशा के पूजा, तर्पण या श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
पंडितजन बताते हैं कि जब हम कुशा की अंगूठी बनाकर तीसरी उंगली में पहनते हैं, तो वो हमें मानसिक और शारीरिक पवित्रता प्रदान करती है। यही वजह है कि ग्रहण के समय से लेकर जल छिड़कने तक, हर शुभ कर्म में कुशा अनिवार्य मानी जाती है।
हालांकि कुश की कहानी सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं बल्कि आयुर्वेद में भी इस कुशा घास में अनगिनत औषधीय गुण बताए गए हैं। इसका रस शुगर को नियंत्रित करता है, इसका अर्क पेट के अल्सर को ठीक करता है और इसका काढ़ा सर्दी-जुकाम में राहत देता है।
कुशा का नियमित सेवन दिल की सेहत को भी बनाए रखता है व किडनी स्टोन जैसी समस्याओं से लड़ने में मदद करता है। इसके पत्ते लंबे और हल्के कांटेदार होते हैं, इसकी जड़ से तेल भी निकाला जाता है और आश्चर्य की बात यह है कि इसके हर हिस्से में औषधि है, इसलिए इसे पंचांग कहा गया है।
यानी, वही कुश जिससे हम पूजा का जल छिड़कते हैं, वो असल में हमारे तन, मन और आत्मा- तीनों को शुद्ध करती है।