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July 16, 2024

देवशयनी एकादशी व्रत कल: एक क्लिक में जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और कथा

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नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पाठ-पूजा और व्रत को काफी महत्व दिया गया है। हर व्रत की अपनी एक अलग विधि और खासियत है। हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। देवशयनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिटते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।

कब है देवशयनी एकादशी व्रत?

इस साल देवशयनी एकादशी के दिन शुभ योग, शुक्ल योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग बन रहे हैं। इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत 17 जुलाई यानी कल है।

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कब है विष्णु पूजा का शुभ मुहूर्त?

आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि का प्रारंभ 16 जुलाई, मंगलवार को शाम 8 बजकर 33 मिनट पर होगा। जबकि, आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि का समापन 17 जुलाई, बुधवार को शाम 9 बजकर 2 मिनट पर होगा। विष्णु पूजा का मुहूर्त सुबह 5 बजकर 34 मिनट से शुरू हो जाएगा।

बन रहा शुभ योग

ब्रह्म मुहूर्त 17 जुलाई सुबह 4 बजकर 13 मिनट से 4 बजकर 53 मिनट तक होगा। देवशयनी एकादशी व्रत पारण का समय 18 जुलाई सुबह 5 बजकर 35 मिनट से 8 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। सर्वार्थ सिद्धि योग 17 जुलाई को सुबह 5 बजकर 34 मिनट से 18 जुलाई को सुबह 3 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। जबकि, अमृत सिद्धि योग 17 जुलाई को 5 बजकर 34 मिनट से 18 जुलाई को सुबह 3 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। इस दौरान सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक शुभ योग भी बन रहा है और उसके बाद पूरे दिन का शुक्ल योग बन रहा है।

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देवशयनी एकादशी व्रत की खासियत

मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी व्रत के दिन से भगवान विष्णु योद निदा में चले जाते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के समय देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ना महत्वपूर्ण होता है। कथा पढ़ने से व्रत पूरा होता है और व्रत का पूरा लाभ मिलता है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति को मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा

देवशयनी एकादशी व्रत से जुड़ी कथा काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ शुक्ल एकादशी की व्रत विधि और महत्व के बारे में बताने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत को देवशयनी एकादशी के नाम से जानते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत जीवों के उद्धार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में जो इस व्रत को नहीं करता है उसे नरक में स्थान मिलता है। ब्रह्म देव ने नारद से इस व्रत के महत्व और विधि को बताया था, वह तुमसे कहता हूं।

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कथा के अनुसार, एक समय में एक महान राजा मांधाता थे- जो कि बहुत ही दयालु, धार्मिक, प्रतापी और सत्यवादी थे। वह अपनी प्रजा की संतान की तरह सेवा करते थे और उनके सुख-दुख का ध्यान रखते थे। उनके राज्य में सभी खुशहाल थे। मगर एक बार ऐसा समय आया कि लगातार तीन साल तक वहां बारिश नहीं हुई। जिसके कारण फसलें बर्बाद हो गईं और अकाल पड़ गया। ऐसे में उनकी प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। इसी के चलते एक दिन प्रजा ने राजा से गुहार लगाई कि आप इस स्थिति से बाहर आने का कोई उपाय करें। राजा मांधाता भी परेशान हो गए। उनसे यह सब देखा नहीं गया और वह अपनी सेना के साथ जंगल की ओर चले गए। राजा काफी दिनों तक यात्रा करते रहे, तब जाकर वह भगवान ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम के पास पहुंचे। अंगिरा ऋषि ने जब उनसे यहां आने का कारण पूछा तो राजा ने पूरी बात उन्हें बताई। उन्होंने बताया कि बारिश ना होने के कारण अकाल पड़ गया है- जिससे उनकी प्रजा परेशान है और अन्न का संकट उत्पन्न हो गया है। हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। इस संकट से निपटने के लिए कोई रास्ता बताएं।
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इस पर फिर अंगिरा ऋषि ने कहा कि आपको आषाढ़ शुक्ल एकादशी की व्रत विधि-विधान से करना चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और आपकी हर मनोकामना पूरी करेंगे। जो भी व्यक्ति इस व्रत को करता है उसके सभी संकट दूर होते हैं और उसे सिद्धियों की प्राप्ति होती है।आपके अर्जित पुण्य से राज्य में बारिश होगी और अन्न का संकट भी दूर होगा।

सभी दुखों का हुआ अंत

इसके बाद जब आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि आई तो राजा ने पूरी प्रजा के साथ इस व्रत को विधिपूर्वक किया। इस व्रत को करने के कुछ समय बाद ही उनके राज्य में बारिश हुई। जिससे फसलों की पैदावार अच्छी हुई और उनका राज्य का सारा संकट खत्म हो गया। साथ ही उनकी प्रजा के सारे दुखों का अंत हो गया।

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