शिमला। हिंदू धर्म में कई व्रत रखे जाते हैं और हर व्रत का अपना एक अलग महत्व है। हिंदू धर्म में संतान के लिए भी कई व्रत रख जाते हैं। जिसमें संतान की भलाई, लंबी उम्र, खुशहाल जीवन और तरक्की को लेकर प्रार्थना की जाती है। हर साल करवाचौथ के चार दिन बाद अहोई अष्टमी का व्रत आता है।
यह व्रत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। आज हम आपको अपने इस लेख में अहोई अष्टमी व्रत की कथा, महत्व और पूजा विधि के बारे में बताएंगे।
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अहोई अष्टमी व्रत
इस साल अहोई अष्टमी तिथि की शुरआत 23 अक्टूबर यानी कल रात 1 बजकर 18 मिनट पर हो गई थी। जो कि आज रात को 1 बजकर 58 मिनट पर समाप्त होगी। इस तिथि के अनुसार, इस साल अहोई अष्टमी का व्रत आज रखा जा रहा है।
क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त?
अहोई व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त आज शाम 5 बजकर 42 मिनट से लेकर 6 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। तारों को देखने का सम 6 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। जबकि, चंद्रोदय का समय 11 बजकर 55 मिनट पर रहेगा।
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क्यों रखा जाता है ये व्रत?
ये व्रत महिलाएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। ये निर्जला व्रत होता है- जिसका पारण तारों को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। यह व्रत अहोई माता की पूजा के साथ जुड़ा है- जो देवी पार्वती का एक रूप मानी जाती हैं और संतान की सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।
क्या है पूजा विधि?
व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है-
- सुबह सवेरे उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल पर अहोई माता का चित्र बनाएं या उनका छपा हुआ चित्र लगाएं। इस चित्र के साथ सप्त ऋषियों के प्रतीक स्वरूप सात सितारे भी बनाएं।
- पूजा में 8 पूड़ी, 8 पुआ और हलवा जरूर रखें।
- मिट्टी के बर्तन या कलश में पानी भरकर अहोई माता के सामने रखें। इस कलश को आम पत्तों से सजाएं और उसके ऊपर एक नारियल रख दें। पूजा स्थल को फूलों और रंगोली से सजाएं।
- शाम को अहोई माता की पूजा करें। पूजा के दौरान सात प्रकार के अनाज जैसे गेहूं, चावल आदि अर्पित करें।
- अहोई माता के लिए मंत्रों का जाप और व्रत कथा का वाचन करें।
- रात में तारे या चंद्रमा देखने के बाद व्रत का पारण करें।
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अहोई अष्टमी व्रत की कथा
अहोई अष्टमी व्रत की कथा के अनुसार, एक बार एक महिला ने अनजाने में एक जंगली साही के बच्चे को मार दिया था। इसके परिणामस्वरूप उसके अपने बच्चों की मृत्यु हो गई। उस महिला ने इस पाप से मुक्ति पाने और अपनी संतानों को वापस पाने के लिए अहोई माता की पूजा की और व्रत रखा। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसके बच्चों को पुनः जीवित कर दिया।