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October 23, 2024

अहोई अष्टमी व्रत कब? जानिए पूजा विधि, मुहूर्त, कथा और नियम

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शिमला। देवभूमि हिमाचल में पूजा-पाठ और व्रत को काफी महत्व दिया जाता है। हिंदू धर्म में कई व्रत रखे जाते हैं और हर व्रत का अपना एक अलग महत्व है। हिंदू धर्म में संतान के लिए भी कई व्रत रख जाते हैं। जिसमें संतान की भलाई, लंबी उम्र, खुशहाल जीवन और तरक्की को लेकर प्रार्थना की जाती है। हर साल दिवाली से पहले संतान के लिए एक महत्वपूर्ण व्रत रखा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को अहोई अष्टमी के नाम से मनाया जाता है। यह भी पढ़ें : हिमाचल में कैबिनेट बैठक आज, जानिए क्या तोहफे देगी सुक्खू सरकार अहोई अष्टमी का व्रत हर साल करवाचौथ के चार दिन बाद आता है। आज हम आपको अपने इस लेख में बताएंगे कि इस साल अहोई अष्टमी का व्रत कब रखा जाएगा। इसी के साथ इस व्रत की विधि, कथा, नियम और महत्व के बारे में बताएंगे।

कब रखा जाएगा अहोई अष्टमी व्रत?

इस साल अहोई अष्टमी तिथि की शुरआत 23 अक्टूबर यानी आज रात 1 बजकर 18 मिनट पर होगी। जोकि, कल 24 अक्टूबर, वीरवार को 1 बजकर 58 मिनट पर समाप्त होगी। इस तिथि के अनुसार, इस साल अहोई अष्टमी का व्रत कल रखा जाएगा। यह भी पढ़ें : हिमाचल सरकार ने फिर किया बड़ा फेरबदल, जानिए किसे कहां मिली पोस्टिंग

क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त?

अहोई व्रत वाले दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 42 मिनट से लेकर 6 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। तारों को देखने का सम 6 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। जबकि, चंद्रोदय का समय 11 बजकर 55 मिनट पर रहेगा।

क्यों रखा जाता है अहोई अष्टमी व्रत?

अहोई अष्टमी व्रत महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। ये निर्जला व्रत होता है- जिसका पारण तारों को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। यह व्रत अहोई माता की पूजा के साथ जुड़ा है, जो देवी पार्वती का एक रूप मानी जाती हैं और संतान की सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। इस व्रत का उद्देश्य माताओं का अपनी संतान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम और उनके सुखी, स्वस्थ जीवन के लिए प्रार्थना करना है। यह भी पढ़ें : दिवाली से पहले इनके खाते में भी आएगी लक्ष्मी- CM सुक्खू ने दी बड़ी राहत

क्या है पूजा विधि और नियम?

अहोई अष्टमी व्रत के दिन कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। अहोई अष्टमी व्रत की पूजा विधि और नियम इस प्रकार है-
  • सुबह सवेरे उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  • माता अहोई का चित्र बनाए- पूजा स्थल पर अहोई माता का चित्र बनाएं या उनका छपा हुआ चित्र लगाएं। इस चित्र के साथ सप्त ऋषियों के प्रतीक स्वरूप सात सितारे भी बनाएं।
  • पूजा में 8 पूड़ी, 8 पुआ और हलवा जरूर रखें। एक मिट्टी के बर्तन या कलश में पानी भरकर अहोई माता के सामने रखें। इस कलश को आम पत्तों से सजाएं और उसके ऊपर एक नारियल रख दें। पूजा स्थल को फूलों और रंगोली से सजाएं।
  • शाम के समय अहोई माता की पूजा करें। पूजा के दौरान सात प्रकार के अनाज जैसे गेहूं, चावल आदि अर्पित करें। इसके बाद अहोई माता के लिए मंत्रों का जाप और व्रत कथा का वाचन करें।
  • रात में तारे या चंद्रमा देखने के बाद व्रत का पारण करें।
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अहोई अष्टमी व्रत की कथा

अहोई अष्टमी व्रत की कथा के अनुसार, एक बार एक महिला ने अनजाने में एक जंगली साही के बच्चे को मार दिया था। इसके परिणामस्वरूप उसके अपने बच्चों की मृत्यु हो गई। उस महिला ने इस पाप से मुक्ति पाने और अपनी संतानों को वापस पाने के लिए अहोई माता की पूजा की और व्रत रखा। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसके बच्चों को पुनः जीवित कर दिया। अहोई अष्टमी व्रत मातृत्व, ममता और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत यह संदेश देता है कि माताएं अपनी संतानों के लिए कठिन तप और व्रत करने को तैयार होती हैं, जिससे उनकी संतानों की भलाई हो सके।

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