#राजनीति
March 10, 2026
हिमाचल की राजनीति में आएगा बड़ा भूचाल! कांग्रेस-भाजपा के 40 दिग्गजों ने की गुप्त बैठक, जानें कारण
कांग्रेस भाजपा के नाराज नेता 2027 में जनता को देंगे मजबूत तीसरा विकल्प
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में आने वाले समय में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। अकसर भाजपा और कांग्रेस के इर्द गिर्द घूमने वाली देवभूमि हिमाचल की पांरपरिक सियासत में अब तीसरे विकल्प की एंट्री होने वाली है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में एक ऐसे तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट तेज हो गई है, जो दोनों प्रमुख दलों के समीकरणों को ध्वस्त करने का माद्दा रखता है। यदि यह मोर्चा आकार लेता है तो राज्य की दो बड़ी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति की नींव तक हिल सकती है।
बड़ी बात यह है कि इस तीसरे मोर्चे की नींव कोई और नहीं बल्कि हिमाचल भाजपा और हिमाचल कांग्रेस के ही कई दिग्गज नेता रखने वाले हैं। जिसमें कुछ पूर्व मंत्री तो कुछ पूर्व विधायक शामिल हैं और इन नेताओं का अपने अपने क्षेत्रों में काफी दबदबा भी है।
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सूत्रों के अनुसार कुल्लू के शांत वातावरण में एक ऐसी गुप्त बैठक हुई, जिसने शिमला से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया। रात्रि के अंधेरे में हुई इस मंत्रणा में प्रदेश के लगभग दस जिलों के दिग्गज नेता जुटे। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में करीब 40 ऐसे चेहरे शामिल थे, जो कभी अपनी.अपनी पार्टियों के स्तंभ माने जाते थे, लेकिन वर्तमान में हाशिए पर हैं। इस गुप्त बैठक में प्रदेश की राजनीति में एक नया तीसरा मोर्चा खड़ा करने की दिशा में गंभीर चर्चा की गई।
इस नए मोर्चे की नींव रखने वालों में पूर्व मंत्रियों और पूर्व विधायकों की एक लंबी सूची है। डॉ रामलाल मार्कंडेय जैसे कद्दावर नेताओं की सक्रियता ने इस अभियान को धार दी है। यह वे नेता हैं जिनका जनाधार आज भी अपने क्षेत्रों में अडिग है। भाजपा और कांग्रेस से नाराज चल रहे इन दिग्गजों का एक साथ आना इस बात का संकेत है कि अब प्रदेश की राजनीति में केवल दो परिवारों या दो विचारधाराओं का एकाधिकार नहीं रहेगा।
बैठक में सबसे महत्वपूर्ण सहमति इस बात पर बनी कि हिमाचल के भविष्य का फैसला अब दिल्ली के बंद कमरों में नहीं, बल्कि हिमाचल की परिस्थितियों के अनुरूप होगा। नेताओं का तर्क है कि राष्ट्रीय दलों के केंद्रीय नेतृत्व को प्रदेश की भौगोलिक और स्थानीय समस्याओं का पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसलिए, एक ऐसे क्षेत्रीय मंच की आवश्यकता है जो केवल हिमाचल के हितों और यहां के संसाधनों के संरक्षण के लिए समर्पित हो।
इस नए गठबंधन ने प्रदेश पर बढ़ते भारी कर्ज को एक बड़ा मुद्दा बनाया है। रणनीति तैयार की गई है कि हिमाचल को केंद्र या कर्ज पर निर्भर रहने के बजाय अपनी वन संपदा, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक दोहन से आत्मनिर्भर बनाया जाए। पर्यटन ढांचे को आधुनिक बनाकर और राजस्व के नए स्रोत पैदा कर राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारना इस मोर्चे का मुख्य लक्ष्य होगा।
आमतौर पर नए राजनीतिक दल किसी एक बड़े चेहरे के सहारे आगे बढ़ते हैं, लेकिन यहां रणनीति अलग है। फिलहाल किसी नेता को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश करने के बजाय पंचायत और ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक अभेद्य जाल बिछाने पर ध्यान दिया जा रहा है। सामूहिक नेतृत्व के साथ जनता के बीच जाकर पहले विश्वास बहाली का कार्य किया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम की खबर मिलते ही दोनों बड़ी पार्टियों में हलचल तेज हो गई है। पार्टी नेतृत्व अब यह जानने की कोशिश कर रहा है कि इस संभावित तीसरे मोर्चे में कौन.कौन से नेता शामिल हो सकते हैं। यदि यह मोर्चा मजबूत हुआ तो आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश की राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
कुल्लू और बिलासपुर के बाद अब इस मोर्चे की अगली महत्वपूर्ण बैठक हमीरपुर में प्रस्तावित है। हमीरपुर को राजनीति का केंद्र माना जाता है, और यहां होने वाली बैठक यह तय करेगी कि यह मोर्चा औपचारिक रूप से कब जनता के सामने आएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गठबंधन एकजुट रहा, तो 2027 में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अपनी जमीन बचाना कठिन हो जाएगा।