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January 31, 2026

हिमाचल की पंचायतों में सुक्खू सरकार ने लगाए एडमिनिस्ट्रेटर, इन अधिकारियों को सौंपी शक्तियां

एडमिनिस्ट्रेटर लेंगे विकास भुगतान और प्रशासनिक फैसले

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himachal Panchyat Election

शिमला। हिमाचल प्रदेश के पंचायती राज इतिहास में पहली बार ऐसा अभूतपूर्व दृश्य सामने आया है, जब राज्य की एक भी पंचायत में निर्वाचित जनप्रतिनिधि मौजूद नहीं हैं। आज से हिमाचल की सभी पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो गया है। यानी आज से पंचायत प्रधान उपप्रधान सहित वार्ड सदस्य के अलावा बीडीसी और जिला परिषद सदस्य पदमुक्त  हो गए हैं।

 

अब पूरे प्रदेश में गांवों की सरकार प्रशासन के हाथों में चली गई है। यानी अब ग्राम स्तर से लेकर जिला स्तर तक फैसले चुने हुए प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सरकारी अधिकारी करेंगे।

राज्य सरकार ने पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों में एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर दिए हैं। इसके साथ ही विकास कार्यों की मंजूरी] भुगतान, योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रशासनिक निर्णय पूरी तरह अधिकारियों के नियंत्रण में आ गए हैं।

किसे सौंपी गई कमान

सरकार द्वारा जारी आदेशों के अनुसार ग्राम पंचायतों में ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) को एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया गया है, जबकि पंचायत सचिव को मेंबर सेक्रेटरी की जिम्मेदारी दी गई है। पंचायत समिति स्तर पर चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर को एडमिनिस्ट्रेटर बनाया गया है। वहीं जिला परिषदों में भी मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रशासनिक मुखिया के तौर पर काम करेंगे।

 

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इस व्यवस्था के लागू होते ही पंचायतों में चुने गए प्रधान, उप प्रधान, वार्ड सदस्य, बीडीसी और जिला परिषद सदस्य पदमुक्त हो गए हैं। प्रदेश की 3,577 पंचायतों में 30 हजार से अधिक जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है।

चुनाव न होने से बनी स्थिति

दरअसल, प्रदेश की पंचायतों और 73 नगर निकायों में दिसंबर-जनवरी में चुनाव प्रस्तावित थे। राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव के लिए तैयार था, लेकिन सरकार ने आपदा और अन्य परिस्थितियों का हवाला देते हुए चुनाव कराने में असमर्थता जताई। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां एक जनहित याचिका पर अदालत ने 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराने के निर्देश दिए।

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हालांकि, चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायतों को बिना निर्वाचित प्रतिनिधियों के ही काम करना होगा। इसी कारण सरकार को एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने का फैसला लेना पड़ा, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से असामान्य माना जा रहा है।

वित्तीय अनुदान पर भी मंडराया संकट

इस अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था का असर वित्त आयोग की ग्रांट पर भी पड़ सकता है। 15वें वित्त आयोग की गाइडलाइन के तहत पंचायतों का निर्वाचित होना जरूरी शर्त है। राहत की बात यह है कि मौजूदा वित्त वर्ष के लिए पंचायतों को 171 करोड़ रुपये की ग्रांट पहले ही मिल चुकी है। लेकिन 31 मार्च के बाद, जब तक चुनाव नहीं होते, तब तक अनुदान पर कटौती की आशंका बनी रहेगी, क्योंकि 1 अप्रैल से 16वां वित्त आयोग लागू हो जाएगा।

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सरकार को होगी आर्थिक राहत

दूसरी ओर, इस व्यवस्था से राज्य सरकार को कुछ वित्तीय राहत भी मिलेगी। पंचायत जनप्रतिनिधियों को हर महीने लगभग 5 करोड़ रुपये मानदेय के रूप में दिए जाते थे। चुनाव होने तक यह खर्च नहीं करना पड़ेगा। यदि अप्रैल तक चुनाव होते हैं, तो सरकार को करीब 15 करोड़ रुपये की बचत होगी।

पहले भी सीमित क्षेत्रों में हो चुका प्रयोग

हालांकि प्रदेश की सभी पंचायतों में एडमिनिस्ट्रेटर की नियुक्ति पहली बार हुई है, लेकिन इससे पहले वर्ष 2021 में कोरोना काल के दौरान लाहौल-स्पीति और पांगी जैसे दुर्गम क्षेत्रों की लगभग 45 पंचायतों में अस्थायी रूप से प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई थी। तब यह प्रयोग सीमित इलाकों तक था, लेकिन इस बार पूरे प्रदेश की पंचायतें प्रशासन के हवाले हैं।

नगर निकायों में भी पहले लग चुके प्रशासक 

 

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पंचायतों से पहले सरकार राज्य के 47 नगर निकायों में भी एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर चुकी है। वहीं, कुछ पंचायत प्रतिनिधि हाल ही में केंद्र सरकार से भी मिलकर अपने कार्यकाल को बढ़ाने की मांग कर चुके हैं।

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