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February 11, 2026

कर्ज के बोझ तले दबा हिमाचल: हर नवजात के सिर पर 1.33 लाख का भार; आगे और बिगड़ेंगे हालात !

आरडीजी बंद होने से आने वाले समय में और बिगड़ सकते हैं हालात

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Himachal Loan

शिमला। शिमला। देवभूमि हिमाचल प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति अब किसी से छिपी नहीं है। प्रदेश को चलाने के लिए सरकार को 'कर्ज पर कर्ज' लेने की मजबूरी आन पड़ी है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश पर कुल कर्ज का बोझ 1,00,000 करोड़ रुपए के पार निकल गया है, जिसने राज्य को देश के टॉप-5 सबसे कर्जदार राज्यों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।

जन्म लेते ही कर्जदार हो रहा बचपन

प्रदेश के वित्तीय हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर दिख रहा है। वर्तमान स्थिति में हिमाचल में पैदा होने वाले हर बच्चे के सिर पर करीब 1.33 लाख रुपए का कर्ज है। यह आंकड़ा न केवल डराने वाला है, बल्कि राज्य के भविष्य की सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगा रहा है। आगामी 10 वर्षों में सरकार को केवल कर्ज अदायगी के रूप में ही 22,000 करोड़ रुपए चुकाने होंगे।

आरडीजी बंद होने पर बढ़ी मुश्किलें

राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) में कटौती ने राज्य की वित्तीय चुनौती को और गहरा कर दिया है। अब तक हर वर्ष औसतन 9 से 10 हजार करोड़ रुपए की आरडीजी से वेतन, पेंशन और अन्य प्रतिबद्ध खर्चों को संभालने में राहत मिलती थी। लेकिन इस मदद पर विराम लगने से सरकार की नकदी स्थिति पर सीधा असर पड़ा है। आने वाले 10 वर्षों में लगभग 22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज चुकाना है, जिससे वित्तीय दबाव और बढ़ेगा।

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वेतन-पेंशन का भारी बोझ

राज्य सरकार पर हर साल करीब 13,837 करोड़ रुपए वेतन, 10,850 करोड़ रुपए पेंशन और 2,508 करोड़ रुपए सब्सिडी के रूप में खर्च करने की बाध्यता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी और पेंशनरों के लगभग 11 हजार करोड़ रुपए की देनदारियां लंबित हैं, जिनमें नए वेतनमान के एरियर और महंगाई भत्ते का बकाया शामिल है। सीमित संसाधनों के बीच इन दायित्वों को पूरा करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

बोर्ड-निगम भी घाटे में

सार्वजनिक उपक्रमों और बोर्ड-निगमों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। विभिन्न निगमों पर कुल मिलाकर करीब 5,000 करोड़ रुपए का घाटा बताया जा रहा है। हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) और बिजली बोर्ड जैसे संस्थान नियमित भुगतान और परिचालन खर्चों को लेकर दबाव में हैं।

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कैसे बढ़ा कर्ज का बोझ

वर्ष 2017 में राज्य पर लगभग 47,906 करोड़ रुपए का कर्ज था। भाजपा सरकार के कार्यकाल के अंत तक यह बढ़कर 76,630 करोड़ रुपए पहुंच गया। वर्तमान सरकार के तीन वर्ष से अधिक के कार्यकाल में कुल देनदारी 1,00,000 करोड़ रुपए से आगे निकल गई है। लगातार बढ़ता यह आंकड़ा वित्तीय प्रबंधन और राजस्व सृजन की रणनीति पर बहस को तेज कर रहा है।

रोजगार की कमी, विदेशों की राह

प्रदेश में सीमित रोजगार अवसरों के कारण युवा विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। अनुमान है कि हर वर्ष करीब 10 हजार युवा रोजगार के लिए विदेश जाते हैं और लगभग 2,030 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा राज्य में भेजते हैं। इसके अलावा हजारों छात्र उच्च शिक्षा के लिए भी विदेश जा रहे हैं। हालांकि यह प्रवृत्ति विदेशी मुद्रा तो ला रही है, लेकिन राज्य के भीतर रोजगार सृजन की कमी को भी उजागर करती है।

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आगे और बिगड़ सकते हैं हालात

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य ने राजस्व बढ़ाने, अनावश्यक खर्चों में कटौती और वित्तीय अनुशासन लागू करने के ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में संकट और गहरा सकता है। आरडीजी में कमी, बढ़ती देनदारियां और सीमित संसाधन इन सबके बीच हिमाचल को अब संतुलित आर्थिक नीति और दीर्घकालिक रणनीति की सख्त जरूरत है।

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