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August 16, 2026
हिमाचल: ज्योतिष के कहने पर सरकारी टीचर ने बदली जन्मतिथि- कोर्ट ने लगाई फटकार
मैट्रिक सर्टिफिकेट में गलती थी तो पहले ही उठाना था कदम- HC
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शिमला। सरकारी नौकरी लगने के बाद अगर किसी कर्मचारी को अपनी जन्मतिथि गलत लगती है, तो उसे बदलवाने के लिए मनमर्जी से कभी भी आवेदन नहीं किया जा सकता। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने जन्मतिथि में सुधार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि सरकारी सेवा में प्रवेश के बाद जन्मतिथि बदलने के लिए निर्धारित दो साल की समयसीमा का सख्ती से पालन करना होगा।
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट ऊना के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक शिक्षक को अपनी जन्मतिथि बदलने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सहानुभूति, न्याय या किसी व्यक्तिगत कारण के आधार पर निर्धारित समयसीमा को बढ़ाया नहीं जा सकता।
मामला शिक्षक सुरेश कुमार से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2001 में ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर नॉन मेडिकल के रूप में सरकारी सेवा ज्वाइन की थी। उनके मैट्रिक प्रमाणपत्र और सर्विस रिकॉर्ड में जन्मतिथि 30 अगस्त 1968 दर्ज थी।
नौकरी में आने के बाद उन्होंने अपनी कुंडली एक ज्योतिषी को दिखाई। ज्योतिषी ने दावा किया कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 1 सितंबर 1969 है। इसके बाद सुरेश कुमार ने स्वास्थ्य विभाग से नया जन्म प्रमाणपत्र बनवाया और मई 2003 में शिक्षा निदेशक के समक्ष अपनी जन्मतिथि में सुधार के लिए आवेदन किया। यानी सरकारी नौकरी ज्वाइन करने के दो साल पूरे होने के बाद जन्मतिथि बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी समयसीमा को हाईकोर्ट ने मामले में महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सेवा में प्रवेश करने के बाद कर्मचारी को जन्मतिथि में सुधार के लिए निर्धारित दो वर्ष के भीतर आवेदन करना अनिवार्य है। अगर कर्मचारी इस अवधि के दौरान आवेदन नहीं करता है, तो बाद में जन्मतिथि बदलने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतें अपनी तरफ से सहानुभूति या किसी तार्किक व्याख्या के आधार पर नियमों में निर्धारित समयसीमा को बढ़ा नहीं सकतीं। जब सेवा नियम दो वर्ष की स्पष्ट अवधि तय करते हैं, तो उसका पालन करना जरूरी है।
अदालत ने यह भी पाया कि सुरेश कुमार को वर्ष 1985 में ही मैट्रिक का प्रमाणपत्र मिल चुका था और उसमें जन्मतिथि दर्ज थी। अगर उन्हें इसमें गलती लगती थी तो उस समय ही इसे ठीक कराने के लिए कानूनी कदम उठाया जा सकता था।
अदालत के अनुसार, जन्मतिथि में सुधार के लिए संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत तीन वर्ष के भीतर, या वयस्क होने के तीन वर्ष के भीतर सिविल मुकदमा दायर किया जाना चाहिए था। लेकिन सुरेश कुमार ने वर्ष 2004 में अदालत का रुख किया, जो निर्धारित समयसीमा के काफी बाद था।
इस मामले में हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि ज्योतिषी की सलाह, बाद में बनवाया गया जन्म प्रमाणपत्र या यह दावा कि कर्मचारी को पहले अपनी सही उम्र का पता नहीं था, कानून में तय समयसीमा को खत्म नहीं कर सकता। फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेवा में दर्ज जन्मतिथि को बदलवाने के लिए तय समयसीमा के भीतर ही कार्रवाई करनी होगी।