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April 4, 2026

हिमाचल में 1905 से भी बड़े भूकंप की चेतावनी! जोन 6 श्रेणी में ये जिला; वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

धर्मशाला में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में बोले वैज्ञानिक

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himachal earthquake risk

धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश के पहाड़] जो अब तक अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए पहचाने जाते रहे हैं] अब एक बड़े भू-गर्भीय खतरे की आहट भी दे रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में राज्य में 1905 के कांगड़ा भूकंप से भी अधिक विनाशकारी झटके महसूस किए जा सकते हैं। यह चेतावनी धर्मशाला में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला ‘हिमालय होराइजन्स: टेक्टोनिक्स, सस्टेनेबिलिटी और रेजिलियंस (HTSR-2026)’ के दौरान सामने आई है।

हिमाचल बना अति-संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र

कार्यशाला में देश-विदेश से आए भू-विज्ञानियों ने स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश अब भूकंप की दृष्टि से पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो चुका है। अब खतरा केवल कुछ जिलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरा प्रदेश उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में शामिल हो गया है।

 

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कांगड़ा पर सबसे बड़ा खतरा

विख्यात भू-विज्ञानी और पद्मश्री डॉ. हर्ष के. गुप्ता ने बताया कि कांगड़ा जिला, जिसे पहले सिस्मिक जोन-5 में रखा जाता था, अब उससे भी अधिक जोखिम वाली स्थिति में पहुंच गया है। वैज्ञानिक इसे ‘सिस्मिक जोन-6’ जैसी श्रेणी मान रहे हैं, जो भारत में आधिकारिक रूप से निर्धारित श्रेणियों से भी अधिक खतरनाक स्तर को दर्शाता है।

ग्लेशियर पिघलने से बिगड़ रहा धरती का संतुलन

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे पहाड़ों के भीतर दबाव का संतुलन बिगड़ रहा है। जहां पहले भारी बर्फ का भार था, वहां अब खालीपन बन रहा है, जिससे भू-गर्भीय संरचना कमजोर हो रही है और फॉल्ट लाइनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। यही स्थिति भविष्य में बड़े भूकंपों का कारण बन सकती है।

 

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मानवीय गतिविधियां भी बढ़ा रहीं खतरा

कार्यशाला में यह भी सामने आया कि केवल प्राकृतिक कारण ही नहीं, बल्कि बढ़ते निर्माण कार्य, सड़क कटिंग, खनन और पर्यावरणीय असंतुलन भी इस खतरे को बढ़ा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने ‘हिमालयन अस्थिरता’ की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा कि प्रकृति और मानव हस्तक्षेप मिलकर पहाड़ों की नींव को कमजोर कर रहे हैं।

आपदा प्रबंधन और निर्माण नीति पर नई चुनौती

इस चेतावनी के बाद राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब भवन निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर की डिजाइनिंग को नए खतरे के स्तर के अनुसार बदलना होगा। भविष्य में ऐसे ढांचे तैयार करने होंगे, जो अधिक तीव्र भूकंप को भी झेल सकें।

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सस्टेनेबिलिटी पर जोर, नहीं तो बड़ा नुकसान तय

अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में शामिल वैज्ञानिकों ने साफ कहा कि अगर समय रहते सस्टेनेबल विकास और आपदा से निपटने की तैयारी नहीं की गई, तो हिमाचल में जान-माल का नुकसान बेहद गंभीर हो सकता है। पर्यावरणीय कारकों जैसे बढ़ते प्रदूषण और वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन को भी हिमालयी असंतुलन का एक कारण बताया गया।

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1905 के कांगड़ा भूकंप की याद

गौरतलब है कि 4 अप्रैल 1905 को हिमाचल के कांगड़ा जिला में एक भीषण भूकंप हुआ था, जिसने भारी तबाही मचाई थी। इस भूकंप से एक लाख से अधिक भवन इमारतें धराशायी हो गई थी और 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस भूकंप में बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई थी। अब वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि भविष्य में इससे भी बड़ा भूकंप आने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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