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May 5, 2026
हिमाचल : पत्नी के हक में कोर्ट का बड़ा फैसला- नौकरी करने पर भी मिलेगा गुजारा भत्ता, पति की अपील खारिज
कोर्ट ने कहा- जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता पति
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मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला से घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पति अपनी जिम्मेदारियों से किनारा नहीं कर सकता है।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश मंडी की अदालत ने पति विजय कुमार द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें उसे अपनी पत्नी कांता देवी को प्रति माह 4,000 रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
मामले के अनुसार, लगधर (कोटली) की रहने वाली कांता देवी का विवाह 10 मार्च 2015 को विजय कुमार के साथ हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही रिश्तों में खटास आने लगी।
कांता देवी ने आरोप लगाया कि पति और ससुराल पक्ष ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि उसे घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। वर्तमान में वह किराये के मकान में रह रही है और उसके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है, जिससे उसका जीवनयापन कठिन हो गया है।
वहीं, अपीलकर्ता विजय कुमार ने ट्रायल कोर्ट के 9 दिसंबर 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला दिया। उसने अदालत में कहा कि वह एक गंभीर रक्त संबंधी बीमारी से जूझ रहा है और चिकित्सकों ने उसे भारी काम करने से मना किया है। इसी वजह से उसकी मासिक आय बहुत सीमित, लगभग 3,000 रुपये ही है।
इसके अलावा उसने यह भी दलील दी कि वह अपने बच्चे की देखभाल भी कर रहा है, जिससे उस पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। पति ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ब्यूटी पार्लर और सिलाई जैसे काम करके आय अर्जित करने में सक्षम है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि, सत्र न्यायालय ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना। अपने फैसले में न्यायाधीश ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित है या कुछ काम करने में सक्षम है, उसे गुजारा भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि वर्तमान महंगाई के दौर में 4,000 रुपये की राशि बहुत अधिक नहीं है-बल्कि यह सिर्फ बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए न्यूनतम सहायता है।
अदालत ने पति द्वारा अपनी बीमारी का जो हवाला दिया, उसे भी संतोषजनक नहीं माना। न्यायालय ने टिप्पणी की कि बीमारी के नाम पर व्यक्ति अपनी वैवाहिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता। पति को अपनी पत्नी के प्रति दायित्व निभाना ही होगा, चाहे परिस्थितियां कैसी भी क्यों न हों।
फैसले के अंत में अदालत ने दोनों पक्षों को निर्देश दिए हैं कि वे आगामी 25 मई को ट्रायल कोर्ट में उपस्थित हों- ताकि आगे की कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। इस निर्णय को महिलाओं के अधिकारों और उनके आर्थिक संरक्षण के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है- जो यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कानून पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा रहता है।