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November 26, 2025

HPU में करोड़ों का घपला ! 11 साल बाद भी नहीं मिला पैसों का हिसाब- राज्यपाल ने मांगा जवाब

विजिलेंस भी नहीं सुलझा पाई HPU बजट की ये पहेली

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HPU Budget Scam

शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय यानी HPU में रेन वाटर हार्वेस्टिंग और शौचालय मरम्मत परियोजना पर स्वीकृत एक करोड़ रुपये की राशि का लेखा-जोखा 11 साल के बाद भी न मिलने के बाद अब पूरा मामला फिर सुर्खियों में है। जिसके चलते राजभवन सचिवालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

HPU में करोड़ों का घपला

जानकारी के अनुसार, दिसंबर 2014 में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) की बैठक में एचपीयू को रेन वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर विकसित करने और परिसर में पुराने शौचालयों की मरम्मत के लिए एक करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी।

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11 साल बाद भी कोई जानकारी नहीं

इसका उद्देश्य था बारिश के पानी के संरक्षण को बढ़ावा देना, विश्वविद्यालय में आधुनिक वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करना और छात्रों और कर्मचारियों को बेहतर स्वच्छता सुविधाएं देना। लेकिन 2025 तक, यानी 11 वर्ष बाद भी परिसर में न एक भी नया रेन वाटर हार्वेस्टिंग टैंक बना, न पाइपलाइन बिछी, न किसी शौचालय का उन्नयन दिखा। सबसे बड़ी बात, इस रकम का यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट यानी UC भी सरकार को नहीं भेजा गया।

विजिलेंस भी नहीं सुलझा पाई पहेली

साल 2018 में राज्य सतर्कता विभाग ने मामले की जांच शुरू की थी। जिसमें, तत्कालीन रेन वाटर हार्वेस्टिंग सेल के सदस्यों से दस्तावेज मांगे गए। खर्च का लेखा–जोखा तलब किया गया और साइट निरीक्षण की भी योजना बनी। लेकिन पाँच साल की जांच के बाद भी न कोई ठोस निष्कर्ष निकला और न किसी अधिकारी पर कार्रवाई हुई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच आगे बढ़ने से पहले ही रेन वाटर हार्वेस्टिंग सेल को समाप्त कर दिया, जिससे मामला धीरे–धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।

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राज्यपाल ने मांगा हिसाब

अब जब राजभवन सचिवालय ने इस एक करोड़ की राशि पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, तब जाकर विश्वविद्यालय प्रशासन सक्रिय हुआ है। सूत्रों के अनुसार, सचिवालय ने मंजूर बजट के उपयोग की स्थिति, प्रकोष्ठ से जुड़े दस्तावेज, योजनाओं की प्रगति और निर्माण से जुड़े बिल और ठेके आदि सबकी जानकारी की मांग की है। लेकिन विश्वविद्यालय के पास इनमें से कोई भी ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

परियोजना को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश

वर्तमान कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने रजिस्ट्रार को ‘जल संग्रहण प्रबंधन प्रकोष्ठ’ को पुनर्जीवित करने के निर्देश दिए हैं। इससे यह संकेत जा रहा है कि विश्वविद्यालय अब इस परियोजना को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि, क्या 11 साल पुराने एक करोड़ रुपये का हिसाब दिए बिना प्रकोष्ठ को फिर सक्रिय करना सिर्फ औपचारिकता है? बहरहाल, राजभवन सचिवालय की रिपोर्ट का इंतजार है और पूरा मामला विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

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