बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार काफी ज्यादा आर्थिक सकंट से जूझ रही है। ऐसे में कई सूबे के कई सरकारी कर्मचारियों को समय पर पैसा नहीं मिल रहा है। यहां तक कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाले करीब 21 हजार वर्कर्स को भी मार्च महीने के बाद से वेतन नहीं मिला है।
तीन महीने से नहीं मिला वेतन
कर्मचारियों का कहना है कि वेतन का मिलने के कारण उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि एक तो उन्हें पहले ही कम पैस मिलते हैं और अब जोकि वो भी समय से नहीं मिल पा रहे हैं।
नाममात्र मानदेय, नहीं हो रहा गुजारा
मिड-डे मील वर्कर्स का कहना है कि उन्हें केवल चार हजार रुपए मानदेय मिलता है। इस नाममात्र मानदेय से गुजारा करना उनके लिए मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि हाल ही में सरकार ने क्लस्टर स्तर पर खाना बनाने का फरमान जारी किया है। अभी तक पिछले 20 वर्षों से स्कूलों में खाना बनता आ रहा है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था इसी क्रम में आगे भी जारी रहनी चाहिए।
7 तारीख को दिया जाए वेतन
उनका कहना है कि उन्हें नियमित किया जाए। साथ ही सभी वर्कर्स को दस की बजाय 12 महीने का वेतन दिया जाए। वेतन की अदायगी हर महीने की 7 तारीख सुनिश्चित की जाए। उन्होंने मांग रखी है कि जिन स्कूलों में 25 बच्चों से ज्यादा की संख्या है वहां पर दो लोगों से काम लिया जाए।
खाली खजाने ने किया हाल बेहाल
बता दें कि आर्थिक संकट से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश के सरकारी खजाने की हालत इतनी खराब हो गई है कि प्रदेश पर ना सिर्फ कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है बल्कि आम लोगों के विकास हित के काम भी प्रदेश सरकार सही ढंग से नहीं करवा पा रही है।
नहीं दे पा रही है हक का पैसा
प्रदेश सरकार के कुल बजट का 42 वां हिस्सा कर्मचारियों को सैलरी और पूर्व कर्मचारियों को पेंशन देने में ही खर्च हो रहा है। ऐसे में नाम मात्र के पैसों से हिमाचल का विकास करना प्रदेश सरकार के लिए मुश्किल होता जा रहा है। स्थिति यह हो गई है की हिमाचल सरकार अपने दम पर ना तो कोई बड़ा प्रोजेक्ट पूरा कर सकती है और ना ही बिना मदद के कर्मचारी और पेंशनर्स को उनके हक का पैसा दे पा रही है।
आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने वित्त आयोग से 15000 करोड़ से अधिक की मदद मांगी है। सुक्खू सरकार ने फाइनेंस कमीशन से 15700 करोड़ रुपए का विशेष ग्रांट प्रदेश सरकार को देने की मांग उठाई है।