नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और व्रत को बहुत महत्व दिया जाता है। हर व्रत किसी ना किसी भगवान को समर्पित है। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। सावन महीने के अंतिम शनिवार के दिन शनि प्रदोष व्रत का शुभ संयोग बन रहा है।
कब है शनि प्रदोष व्रत?
इस बार शनि प्रदोष व्रत 17 अगस्त को यानी कल है। शनिवार को आने वाले प्रदोष तिथि के व्रत को शनि प्रदोष या शनि त्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। यह भी पढ़ें: हिमाचल की लड़की को महंगी पड़ी दोस्ती: युवक ने जीरकपुर बुलाकर लूटी आबरूकब है पूजा का शुभ मुहूर्त?
हिंदू पंचाग के अनुसार, त्रयोदशी तिथि 17 अगस्त को सुबह 08 बजकर 05 मिनट पर शुरू होगी। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 18 अगस्त को सुबह 05 बजकर 50 मिनट पर होगा। पंचांग के अनुसार, इस साल सावन माह का प्रदोष व्रत 17 अगस्त को मनाया जाएगा और शाम को विधिवत पूजा के साथ इसका समापन किया जाएगा।क्या है शनि प्रदोष व्रत?
शनि प्रदोष व्रत एक विशेष उपवास है जो हिंदू धर्म में भगवान शिव और शनि देव को समर्पित होता है। यह व्रत प्रत्येक माह के त्रयोदशी (प्रदोष) तिथि को रखा जाता है, जब यह दिन शनिवार के दिन पड़ता है, तब इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है।कौन से बन रहे शुभ योग?
इस बार शनि प्रदोष व्रत पर कई शुभ फलदायी योग बन रहे हैं- जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। इस बार- प्रीति योग
- आयुष्मान योग
- लक्ष्मी नारायण योग आदि शुभ योग बन रहे हैं।
क्यों रखना चाहिए शनि प्रदोष व्रत?
शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव और शनिदेव की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भगवान शिव शनिदेव के गुरु हैं। ऐसे में भगवान शिव की पूजा करने वाले लोगों पर शनिदेव कभी भी कुदृष्टि नहीं डालते हैं। मान्यताओं के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत करने से--
शनि देव की कृपा प्राप्ति
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कष्टों का निवारण
- धन-धान्य की वृद्धि
- स्वास्थ्य लाभ
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भगवान शिव की कृपा प्राप्ति
क्या है शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि?
शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि में भगवान शिव और शनि देव की विशेष आराधना की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि को पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ करना चाहिए। शनि प्रदोष व्रत के दिन-- सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
- साफ और शांत स्थान पर बैठकर भगवान शिव और शनि देव का ध्यान करें।
- व्रत का संकल्प लें, जिसमें आप मन, वचन और कर्म से पूरे दिन व्रत का पालन करेंगे और संध्या समय पूजा करेंगे।
- घर के पूजा स्थल में या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करें।
- शिवलिंग को गंगाजल, दूध, दही, शहद, और पंचामृत से स्नान कराएं।
- शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करें। बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है।
- शनि देव की प्रतिमा या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- शनि देव को काले तिल, सरसों का तेल, नीले फूल, और काले वस्त्र अर्पित करें।
- ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का जाप, शिव चालीसा और शनि चालीसा का पाठ करें।
- भगवान शिव और शनि देव को फल, मिठाई, और अन्य प्रसाद अर्पित करें।
- श्रद्धा के साथ भोग लगाएं और दीपक व धूप जलाकर आरती करें।
- प्रदोष काल, जो सूर्यास्त से लगभग 1.5 घंटे पहले से लेकर सूर्यास्त के 1.5 घंटे बाद तक का समय होता है, इस समय में भगवान शिव और शनि देव की विशेष पूजा करें।
- इस समय शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं और भगवान शिव का ध्यान करें।
- व्रत का समापन रात्रि में भगवान शिव की आरती और प्रसाद वितरण के बाद करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दें।
- रात को हल्का भोजन करके व्रत का पारण करें।
