मंडी। हिमाचल के मंडी जिले की पहचान सिर्फ छोटी काशी के नाम से नहीं, बल्कि उसकी जीवंत देव परंपराओं और सदियों पुराने शिवरात्रि महोत्सव से भी जुड़ी है। हर साल फाल्गुन मास में सजने वाला यह महोत्सव देव संस्कृति का अद्भुत संगम होता है, जहां सैकड़ों देवी-देवताओं की पालकियां राजदेवता माधव राय के सान्निध्य में एकत्र होती हैं।

500 साल का जश्न

इस भव्य परंपरा के बीच एक ऐसा विवाद भी है, जिसकी ठंडक आज तक खत्म नहीं हो पाई है। इस वर्ष मंडी नगर की स्थापना के 500 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1527 में राजा अजबर सेन द्वारा बसाए गए इस ऐतिहासिक शहर के लिए यह शिवरात्रि महोत्सव और भी खास माना जा रहा है।

 

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पांच देवी-देवता आज भी नाराज

पूरे शहर को सजाया जा रहा है, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार है और प्रशासन इसे यादगार बनाने में जुटा है। बावजूद इसके, सनोरघाटी और द्रंग क्षेत्र के पांच देवी-देवताओं की अनुपस्थिति इस ऐतिहासिक आयोजन पर एक सवालिया निशान छोड़ रही है।

सम्मानित अतिथि थे ये देवता

ज्वालापुर क्षेत्र के देव कगसी नारायण, देव बरनाग, चंडोही गणपति, देव खबलासी नारायण और द्रंग क्षेत्र की माता कुमणी कभी मंडी शिवरात्रि के नियमित और सम्मानित अतिथि हुआ करते थे। रियासत काल में राजा स्वयं इन देवताओं को निमंत्रण भेजते थे और उनकी पालकियों का विशेष सम्मान किया जाता था।

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क्या है विवाद की वजह?

उस दौर में शिवरात्रि महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देव-राजा और प्रजा के बीच संबंधों का प्रतीक भी था। इन देवताओं के शिवरात्रि में न आने के पीछे एक प्रसिद्ध धुरी विवाद रहा है, जो आज भी देव परंपराओं में चर्चा का विषय है।

 

मान्यता के अनुसार राजदेवता माधव राय की पालकी के दाएं और बाएं चलने का स्थान देवताओं की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान से जुड़ा होता है। दायां स्थान श्रेष्ठ माना जाता था। इसी प्रोटोकॉल को लेकर चंडोही गणपति और देव बरनाग के बीच तीखा विवाद हुआ।

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परंपरा कहती है कि यह विवाद केवल स्थान का नहीं, बल्कि देव सम्मान और अहं का प्रतीक बन गया। इसी नाराजगी में इन देवताओं ने शिवरात्रि के जलेब में शामिल होने से इंकार कर दिया।

आजादी के बाद भी नहीं सुलझी गांठ

रियासत समाप्त होने और आजादी के बाद प्रशासन ने राजा की भूमिका संभाली, लेकिन देवताओं की नाराजगी दूर नहीं हो सकी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार देवता यहां केवल प्रतीक नहीं, बल्कि जीवंत सत्ता माने जाते हैं। उनके अपने भाव, स्मृतियां और इतिहास होते हैं। एक बार यदि देव परंपरा में अपमान या असंतोष दर्ज हो जाए, तो उसे समाप्त करना आसान नहीं होता।

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मनाने की कोशिशें रहीं नाकाम

सर्व देवता कमेटी के अध्यक्ष पंडित शिवपाल के अनुसार इन देवताओं को मनाने और पुराने विवाद को खत्म करने के कई प्रयास किए गए। बैठकें हुईं, संवाद स्थापित करने की कोशिश की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया। परिणामस्वरूप 500वें वर्ष के इस ऐतिहासिक शिवरात्रि महोत्सव में भी इन पांच देवताओं की पालकियां मंडी नहीं पहुंचेंगी।

देव संस्कृति की जटिलता और सम्मान का प्रश्न

यह विवाद मंडी की देव संस्कृति की गहराई और संवेदनशीलता को भी उजागर करता है। यहां परंपराएं केवल रस्म नहीं, बल्कि सम्मान और संतुलन का प्रश्न होती हैं। शिवरात्रि महोत्सव जहां एक ओर देव एकता का प्रतीक है, वहीं यह धुरी विवाद बताता है कि देव समाज में भी मान-सम्मान और प्रोटोकॉल कितने अहम हैं।

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500 वर्षों का जश्न अपनी जगह ऐतिहासिक है, लेकिन सनोरघाटी और द्रंग के इन देवताओं की अनुपस्थिति यह याद दिलाती है कि मंडी की शिवरात्रि केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और अधूरी कहानियों का भी संगम है।

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