शिमला। हिमाचल प्रदेश की सियासत और गांवों की व्यवस्था में 1 फरवरी से एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। जिन पंचायत प्रधानों के दरवाजे तक अब तक रोज़ फरियादी पहुंचते थे और जिनकी मोहर से गांवों के बड़े फैसले होते थे, उनकी वैधानिक शक्तियों पर अब विराम लगने वाला है। प्रदेश की सभी 3577 पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होते ही निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका खत्म हो जाएगी।
मतदाता सूची छपना शुरू
पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव की प्रक्रिया के तहत राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों पर जिला उपायुक्तों ने मतदाता सूचियों का प्रकाशन शुरू कर दिया है। शिमला जिला में शुक्रवार शाम पांच बजे पंचायत मतदाता सूची सार्वजनिक कर दी गई। जिन लोगों के नाम सूची में शामिल नहीं हैं, वे चुनाव कार्यक्रम जारी होने तक अपना नाम दर्ज करवा सकेंगे।
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2 रुपये में पंचायत वोट
ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता पंचायत सचिव या बीडीओ कार्यालय में मात्र दो रुपये शुल्क देकर वोट बनवा सकेंगे, जबकि शहरी निकायों में यह शुल्क 50 रुपये निर्धारित किया गया है। एक बार सूची सार्वजनिक हो जाने के बाद उसमें से नाम नहीं हटाए जाएंगे।
55 लाख से ज्यादा मतदाता, संख्या और बढ़ेगी
राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार हिमाचल प्रदेश के पंचायत क्षेत्रों में 55 लाख से अधिक मतदाता हैं। नए नाम जुड़ने से यह संख्या और बढ़ेगी। वहीं प्रदेश की 31 पंचायतों का पुनर्गठन और परिसीमन पूरा हो चुका है, जिसकी फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई है। मंजूरी के बाद इसे सार्वजनिक कर 15 दिन के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे जाएंगे।
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हाईकोर्ट की डेडलाइन, मार्च-अप्रैल में चुनाव संभव
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल तक पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में राज्य निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी को अदालत में जवाब दाखिल करना है। आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि नई पंचायतों के गठन पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।
1 फरवरी से छिन जाएंगी प्रधानों की शक्तियां
पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होते ही 1 फरवरी से पंचायतों की शक्तियां प्रशासकों के पास चली जाएंगी। पंचायतीराज विभाग ने इस संबंध में प्रस्ताव सरकार को भेज दिया है। इसमें दो विकल्प रखे गए हैं या तो पंचायत सचिव को शक्तियां दी जाएं या फिर तीन सदस्यीय कमेटी गठित की जाए।
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प्रधानों की मोहर होगी बेअसर
प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम के तहत पांच साल का कार्यकाल पूरा होते ही पंचायत प्रधान, उपप्रधान और सदस्यों की वैधानिक शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी। इसके साथ ही पंचायतों में इस्तेमाल होने वाली प्रधानों की मुहर भी 1 फरवरी से किसी काम की नहीं रहेगी।
पहले भी बन चुकी है ऐसी स्थिति
प्रदेश में इससे पहले कोविड काल के दौरान लाहौल-स्पीति और पांगी जैसे दुर्गम इलाकों में चुनाव टलने पर तीन सदस्यीय कमेटियों के माध्यम से पंचायतों का संचालन किया गया था। हालांकि पूरे प्रदेश में एक साथ हजारों पंचायतों की शक्तियां प्रशासकों के पास जाना, यह स्थिति पहली बार बनने जा रही है।
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लोगों के मन में सवाल
अब गांवों में आम आदमी की समस्या कौन सुनेगा, विकास कार्यों की रफ्तार क्या रहेगी और प्रशासन इस खालीपन को कैसे भरेगा—ये सवाल आने वाले दिनों में अहम रहने वाले हैं। अंतिम फैसला सरकार को लेना है कि पंचायतों की कमान सचिवों को दी जाए या कमेटियों को।
