कुल्लू। हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने विकास के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ करने वालों को कड़ा संदेश देते हुए सख्त फैसला सुनाया है। एनजीटी के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि चाहे आम हो या खास प्रकृति से खिलवाड़ किसाी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

 

एनजीटी ने हिमाचल कांग्रेस के मंत्री विक्रमादित्य सिंह के लोक निर्माण विभाग और उसके एक ठेकेदार को भारी भरकम 47.14 लाख रुपए पर्यावरणीय मुआवजा भरने का ऐतिहासिक आदेश सुनाया है। यह आदेश कुल्लू स्थित प्रसिद्ध हिमालयन ट्राउट फिश फार्म को हुए भारी नुकसान के बदले पर्यावरणीय मुआवजे के रूप में जारी किया गया है।

जानें पूरा मामला

मामला कुल्लू जिला के हरिपुर नाले पर पुल निर्माण से जुड़ा है, जहां निर्माण कार्य के दौरान नियमों को दरकिनार कर भारी मात्रा में मलबा सीधे नाले में डंप कर दिया गया। इस अवैध कार्रवाई से न केवल जल स्रोत प्रदूषित हुआ, बल्कि नाले के निचले हिस्से में स्थित हिमालयन ट्राउट फिश फार्म को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा। प्रदूषित पानी के कारण फार्म में मौजूद हजारों ट्राउट मछलियों के अंडे नष्ट हो गए, जिससे फार्म मालिक को बड़ा आर्थिक झटका लगा।

 

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PWD की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि लोक निर्माण विभाग और उसके ठेकेदार द्वारा जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 का उल्लंघन किया गया है। ट्रिब्यूनल ने माना कि निर्माण गतिविधियों के दौरान अपनाई गई लापरवाही सीधे तौर पर जल प्रदूषण और जैविक क्षति का कारण बनी।

हिमालयन ट्राउट फिश फार्म को हुआ भारी नुकसान

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि मत्स्य विभाग, राजस्व अधिकारियों, ग्राम पंचायत और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की गई संयुक्त निरीक्षण रिपोर्टों से यह पूरी तरह प्रमाणित होता है कि पुल निर्माण के दौरान नाले में डाला गया मलबा पर्यावरण के लिए घातक साबित हुआ। इन रिपोर्टों में फिश फार्म को हुए नुकसान और जल गुणवत्ता में आई गिरावट की स्पष्ट पुष्टि की गई है।

 

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दो माह में जमा करवानी होगी मुआवजा राशि

एनजीटी ने पीडब्ल्यूडी और ठेकेदार को निर्देश दिए हैं कि वे दो महीने के भीतर 47.14 लाख रुपये की मुआवजा राशि जमा करें। साथ ही ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार या संबंधित विभाग को यह अधिकार होगा कि वह यह राशि आगे चलकर दोषी ठेकेदार से वसूल सके।

 

इस फैसले को हिमाचल में विकास कार्यों के दौरान पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी पर एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। एनजीटी का यह आदेश साफ संदेश देता है कि चाहे विभाग किसी भी मंत्री के अधीन क्यों न हो, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली लापरवाही पर जिम्मेदारी तय की जाएगी और इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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