शिमला। हिमाचल प्रदेश इस समय अपने सबसे बुरे वित्तीय दौर से गुजर रहा है। एक तरफ राज्य का वित्त विभाग प्रदेश की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए आम लोगों की सब्सिडी खत्म करने, नई भर्तियों पर रोक लगाने और कर्मचारियों के वेतन-भत्तों को रोकने की सख्त सिफारिशें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार के 'सियासी खर्चों' पर पूरी तरह खामोश है।
विशेषज्ञों और आम जनता के बीच इस बात को लेकर भारी रोष है कि सरकार वित्तीय अनुशासन का पाठ केवल जनता को पढ़ा रही है जबकि मंत्रियों, विधायकों और सलाहकारों की सुख-सुविधाओं पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।
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नेताओं की सैलरी में भारी इजाफा
हैरानी की बात ये है कि जब प्रदेश कर्ज के बोझ तले दबा था, तब पिछले बजट सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष ने एकजुट होकर अपने वेतन-भत्तों में 24 फीसदी की बढ़ोतरी कर ली। अब स्थिति ये है कि:
- विधायकों को करीब 2.75 लाख रुपये मासिक मिलते हैं।
- मंत्रियों का वेतन लगभग 3 लाख रुपये है।
- मुख्यमंत्री की पगार सवा तीन लाख रुपये के करीब है।
- इतना ही नहीं, भविष्य के लिए ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि ये वेतन हर 5 साल में खुद-ब-खुद बढ़ता रहेगा।
सलाहकारों पर मेहरबान सरकार
सरकार ने राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए सलाहकारों और ओएसडी (OSD) की एक लंबी फौज खड़ी कर दी है। इनमें से कई को कैबिनेट रैंक दिया गया है जिसका सीधा मतलब है कि उन्हें मंत्रियों के बराबर वेतन और सुविधाएं मिल रही हैं।
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मुख्यमंत्री के राजनीतिक और मीडिया सलाहकारों को हर महीने 2.50 लाख रुपये वेतन दिया जा रहा है। इसके अलावा गाड़ी, बंगला, मेडिकल और यात्रा भत्ता अलग से है। निगमों और बोर्डों के अध्यक्षों का मानदेय जो पहले 15 से 30 हजार रुपये हुआ करता था, उसे बढ़ाकर अब सवा लाख रुपये तक कर दिया गया है।
वकीलों की फौज व भारी मानदेय
कानूनी मोर्चे पर भी सरकार ने राजनीतिक नियुक्तियों में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिमाचल सरकार ने मुकदमों की पैरवी के लिए 75 से ज्यादा अतिरिक्त, उप और सहायक महाधिवक्ता नियुक्त किए हैं। एक अतिरिक्त महाधिवक्ता को ही करीब 1.35 लाख रुपये मासिक मानदेय दिया जा रहा है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ और विपक्ष ?
पूर्व आर्थिक सलाहकार प्रदीप चौहान का कहना है कि इस बदहाली के लिए नेता और अफसर दोनों जिम्मेदार हैं। वित्त विभाग ये सुझाव क्यों नहीं देता कि सलाहकारों और राजनीतिक ओहदेदारों के खर्चे कम किए जाएं ? वहीं, पूर्व वरिष्ठ IAS अधिकारी तरूण श्रीधर का मानना है कि लोकतंत्र में कोई 'खास' नहीं होना चाहिए और सरकार को 'अनुत्पादक खर्चों' (जिनसे कोई रेवेन्यू न मिले) को तुरंत बंद करना चाहिए।
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पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि गरीब की जेब पर कैंची चलाने के बजाय सरकार को अपने उन फिजूलखर्चों को रोकना चाहिए जो उन्होंने बोर्डों के अध्यक्षों और सलाहकारों की फौज पर बढ़ाए हैं।
राजेश धर्माणी ने रखा अपना पक्ष
हालांकि कैबिनेट मंत्री राजेश धर्माणी का तर्क है कि राजनीतिक नियुक्तियां जरूरत के अनुसार होती हैं और केंद्र सरकार द्वारा 'राजस्व घाटा अनुदान' (RDG) बंद करने की वजह से हिमाचल के हाथ बंध गए हैं। उनके अनुसार, ₹6,000 करोड़ के वित्तीय घाटे को भरने के लिए हर वर्ग के सहयोग की जरूरत है।
