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October 20, 2026
कुल्लू दशहरा : कटोरी रूप में दर्शन देती हैं ये देवी माँ- लोहे के ओले बरसाकर भगाए थे सैनिक- जानें पूरी कहानी
60 से ज्यादा गांवों की अधिष्ठात्री हैं माता भेखली
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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू दशहरा सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की सदियों पुरानी देव परंपराओं और आस्था से जुड़ा खास पर्व है। मान्यता है कि दशहरा शुरू होते ही घाटी के अलग-अलग इलाकों से देवी-देवता ढालपुर पहुंचते हैं और पूरा माहौल देवमय हो जाता है। इसी देव परंपरा से जुड़ी कुछ मान्यताएं ऐसी भी हैं, जो कुल्लू दशहरा को बाकी जगहों से अलग बनाती हैं।
बता दें कि कुल्लू की एक देवी ऐसी भी हैं, जो रथ यात्रा में शामिल नहीं होतीं। ये हैं माता भुवनेश्वरी, जिन्हें माता भेखली के नाम से भी जाना जाता है। भेखली पहाड़ी पर माता भुवनेश्वरी का मंदिर है। माता को 60 से ज्यादा गांवों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। पूरे साल यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।
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मान्यता है कि जब ढालपुर में कुल्लू दशहरा मनाने की शुरुआत हुई, तो जिले के अलग-अलग इलाकों के देवी-देवताओं को उत्सव में बुलाया गया। लेकिन माता भेखली ने दशहरा उत्सव में जाने से मना कर दिया। इसके बाद कुल्लू के राजा ने माता को लाने के लिए अपने सैनिक भेजे, लेकिन सैनिक भी माता को वहां से नहीं ला सके।
भगवान रघुनाथ के कारदार और राज परिवार के सदस्य दानवेंद्र सिंह के अनुसार, पुराने समय में शाही परिवार के पूर्वजों ने माता भेखली को दशहरा उत्सव में लाने की कोशिश की थी। बताया जाता है कि राज सैनिक माता का रथ जबरदस्ती मंदिर से करीब 100 मीटर दूर तक ले आए। इसके बाद अचानक सैनिकों पर लोहे के बड़े-बड़े ओले बरसने लगे। इससे कई सैनिक घायल हो गए और डरकर वहां से भाग गए। इसके बाद राजा ने माता से इस घटना के लिए माफी मांगी।
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आज भी कुल्लू दशहरा शुरू होने के पहले दिन माता भेखली के रथ को पुजारी सजाता है। इसके बाद माता का रथ उसी जगह तक आता है, जहां तक पुराने समय में सैनिक उसे जबरदस्ती लेकर गए थे। वहीं पर देव परंपरा पूरी की जाती है। इसके बाद ढालपुर मैदान में रथ यात्रा शुरू होती है और माता भेखली का रथ वापस अपने भंडार की ओर लौट जाता है। यानी माता खुद रथ यात्रा में शामिल नहीं होतीं।
दशहरा उत्सव के छठे दिन माता भेखली एक खास रूप में ढालपुर मैदान पहुंचती हैं। इस दिन माता कटोरी के रूप में आती हैं। इस कटोरी में विशेष रूप से तिलक रखा जाता है। यही तिलक भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार और वर्तमान में राजा महेश्वर सिंह को लगाया जाता है।
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इसके बाद माता की कटोरी को भगवान रघुनाथ की गद्दी पर रखा जाता है। इस रूप में माता छठे दिन भक्तों को दर्शन देती हैं। माता के इस स्वरूप के दर्शन करने के लिए भी हजारों श्रद्धालु ढालपुर पहुंचते हैं।
माता के भंडारी राकेश शर्मा के अनुसार, जहां आज मंदिर बना है, वहां पहले भेखल का एक पेड़ हुआ करता था। मान्यता है कि उस पेड़ के पास रोज एक दिव्य कन्या दिखाई देती थी।
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जब स्थानीय लोगों ने उस कन्या से उसकी पहचान पूछी तो उसने बताया कि वह उड़ीसा के जगन्नाथ से यहां आई है और अब यहीं निवास करेगी। इतना कहने के बाद वह कन्या भेखल के पेड़ के नीचे बनी एक गुफा में चली गई। इसके बाद वहां अपने आप आग जलने लगी। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने उसे देवी का रूप माना और वहां माता भुवनेश्वरी का मंदिर स्थापित किया।
राकेश शर्मा ने बताया कि स्थानीय देवी-देवताओं की देववाणी के अनुसार माता भेखली करीब 1400 साल पहले इस पहाड़ी पर बसी थीं। उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी से आने की मान्यता के कारण माता को जगन्नाथी नाम से भी जाना जाता है।
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माता के सभी प्रमुख त्योहार स्थानीय ग्रामीण मिलकर पूरे उत्साह और धूमधाम से मनाते हैं। कुल्लू दशहरा में माता का ढालपुर न जाना भी इसी पुरानी देव परंपरा का हिस्सा माना जाता है।