#उपलब्धि
September 22, 2026
20 दिन में औपचारिकताएं पूरी करने की तैयारी

हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से तकनीकी प्रतिभा की एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसमें सीमित संसाधनों के बीच एक छात्र ने ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। सरकारी पॉलीटेक्निक कॉलेज हमीरपुर में कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे पांचवें सेमेस्टर के छात्र सर्वेश शर्मा ने शुरुआती स्तर पर करीब 87 हजार रुपये की लागत से ड्रोन तैयार किया।
दरअसल, सर्वेश के प्रोजेक्ट के लिए रक्षा मंत्रालय के डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन (DIO) और इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) के तहत 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर की गई है। प्रोजेक्ट का उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में निगरानी से जुड़ी जरूरतों के लिए ड्रोन तकनीक को विकसित करना है। सर्वेश ने इस प्रोजेक्ट पर काम छोटे स्तर से शुरू किया था।
शुरुआती चरण में ड्रोन तैयार करने में करीब 87 हजार रुपये खर्च हुए। इसके बाद प्रोजेक्ट को रक्षा क्षेत्र की एक वास्तविक चुनौती से जोड़ने की दिशा में काम आगे बढ़ा। सर्वेश द्वारा विकसित किए जा रहे ड्रोन का नाम रुद्रा एज टी-1 (स्पेक्ट्रा) बताया गया है। संस्थान के अनुसार इस ड्रोन की तकनीक को इस तरह विकसित करने पर काम किया जा रहा है कि सीमा निगरानी के दौरान यह रडार से बचाव और जैमर के प्रभाव जैसी चुनौतियों से निपटने में सक्षम हो सके।
हालांकि प्रोजेक्ट अभी विकास के चरण में है और इसके तकनीकी स्वरूप को आगे के परीक्षणों तथा विकास के बाद ही पूरी तरह आंका जा सकेगा। सर्वेश के अनुसार इस प्रोजेक्ट की शुरुआती प्रेरणा उसे एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के दौरान मिली। उसने आईआईटी जोधपुर और कोनार्क कोर की ओर से आयोजित ओपन कार्ड बोर्ड ड्रोन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था।
इस प्रतियोगिता में देशभर के करीब 50 संस्थानों की टीमों ने भाग लिया। सर्वेश की टीम ने प्रतियोगिता में चौथा पुरस्कार हासिल किया, जिसके तहत टीम को 10 लाख रुपये का पुरस्कार मिला। प्रतियोगिता के दौरान ड्रोन की तकनीक और उसके संभावित इस्तेमाल से जुड़े अनुभवों ने सर्वेश को आगे कुछ अलग विकसित करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उसने सीमा निगरानी से जुड़ी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया।
प्रोजेक्ट का अगला चरण केवल एक शैक्षणिक मॉडल तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसे रक्षा क्षेत्र में उपयोग होने वाली ड्रोन तकनीक की संभावनाओं से जोड़कर विकसित किया जा रहा है। संस्थान के मुताबिक रुद्रा एज टी-1 (स्पेक्ट्रा) के विकास में विशेष रूप से ऐसे तकनीकी पहलुओं पर काम किया जा रहा है, जिनका संबंध रडार से बचाव और जैमिंग के दौरान ड्रोन के संचालन से है। रक्षा मंत्रालय से मिली ग्रांट के बाद सर्वेश को इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करने के लिए आवश्यक संसाधन और तकनीकी सहयोग मिलने की संभावना है।
प्रोजेक्ट से संबंधित आगे की प्रक्रिया के लिए सर्वेश को 20 दिन की समयसीमा दी गई है। इसके बाद प्रोजेक्ट को निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए आईआईटी रुड़की में इनक्यूबेशन सेंटर बनाया गया है। यहीं से सर्वेश अपने प्रोजेक्ट के अगले चरण पर काम करेगा। पूरे प्रोजेक्ट को लगभग 20 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस दौरान ड्रोन के डिजाइन, तकनीकी क्षमता और रक्षा क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप उसके विकास पर आगे काम किया जाएगा।
सर्वेश शर्मा हमीरपुर जिले के बाहनवीं गांव से संबंध रखता है। उसका परिवार सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है। उसके पिता संजीव शर्मा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और इसी मेहनत से परिवार का खर्च चलाने के साथ बेटे की पढ़ाई में सहयोग कर रहे हैं। सर्वेश ने अपनी शुरुआती शिक्षा से लेकर सेकेंडरी स्तर तक की पढ़ाई राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बाहनवीं से पूरी की।
इसके बाद उसने सरकारी पॉलीटेक्निक कॉलेज हमीरपुर में कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच तकनीकी क्षेत्र में काम करते हुए सर्वेश ने जिस स्तर तक अपने प्रोजेक्ट को पहुंचाया है, उससे उसके कॉलेज में भी इस उपलब्धि को लेकर उत्साह है। ₹3.50 करोड़ की ग्रांट की मंजूरी सर्वेश के प्रोजेक्ट के लिए एक महत्वपूर्ण अगला चरण है, लेकिन अब उसके सामने इस तकनीक को तय मानकों के अनुरूप विकसित और परीक्षण करने की चुनौती होगी।
अगले करीब 20 महीनों में प्रोजेक्ट को किस तरह विकसित किया जाता है और परीक्षणों में यह किस स्तर तक सफल होता है, इस पर आगे की दिशा निर्भर करेगी। फिलहाल हमीरपुर के एक सरकारी संस्थान से निकलकर रक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रोजेक्ट तक पहुंचा यह प्रयास तकनीकी शिक्षा और नवाचार के बीच एक उल्लेखनीय उदाहरण के रूप में सामने आया है।