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September 27, 2026
हिमाचल : करोड़पति ने खुद को बताया क्लर्क, पत्नी को महीने का खर्च देने से मुकरा- HC ने लताड़ा
कोर्ट ने पत्नी को 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के दिए आदेश
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता से जुड़े एक मामले में पति की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलना उसका कानूनी अधिकार है।
अदालत ने पति की उस दलील को स्वीकार नहीं किया, जिसमें उसने खुद को पिता की दुकान पर महज 10 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाला क्लर्क बताया था। अदालत ने पाया कि पति का परिवार आर्थिक रूप से संपन्न है और उसके पिता का तीन मंजिला व्यावसायिक परिसर है।
सुनवाई के दौरान सामने आई जानकारी के अनुसार, परिवार के कारोबार का सालाना टर्नओवर कई करोड़ रुपये बताया गया। ऐसे में पति की ओर से अपनी आय को केवल 10 हजार रुपये मासिक बताने के दावे पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाए।
यह मामला मंडी फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था- जिसमें पत्नी को आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी धारा 125 CrPC के तहत हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। पति ने इसी आदेश को हिमाचल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और पति की याचिका पूरी तरह खारिज कर दी। पीठ में न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल शामिल थे।
पति की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह अपने पिता के कारोबार में केवल क्लर्क के तौर पर काम करता है। उसका दावा था कि उसे हर महीने सिर्फ 10 हजार रुपये वेतन मिलता है। पति ने यह भी तर्क रखा कि उनका बेटा उसके साथ रह रहा है। इसके अलावा पत्नी को घरेलू हिंसा कानून के तहत पहले से 2,500 रुपये प्रतिमाह मिल रहे हैं।
पति ने यह भी कहा कि उसकी पत्नी एक स्कूल में अध्यापिका के रूप में काम करती है और करीब 8 हजार रुपये प्रतिमाह कमाती है। उसके अनुसार पत्नी की अपनी आय होने के कारण उसे 10 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश उचित नहीं है। ऐसे में फैमिली कोर्ट के आदेश में बदलाव किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखने के बाद पति के आय संबंधी दावे को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि पति अपने माता-पिता की इकलौती संतान है।
उसके पिता की उम्र करीब 75 वर्ष बताई गई। साथ ही उनके पास तीन मंजिला व्यावसायिक परिसर होने की जानकारी सामने आई। सुनवाई के दौरान पति से हुई जिरह में उसके परिवार के कारोबार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी सामने आई। अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य पर गौर किया कि जिरह के दौरान पति ने स्वयं स्वीकार किया कि परिवार के कारोबार का सालाना टर्नओवर कई करोड़ रुपये है।
क्या बोला हाईकोर्ट?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की अपनी कुछ आमदनी होने से पति उसे गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने माना कि इतनी सीमित आय को आधार बनाकर पत्नी को उसके वैवाहिक जीवन के अनुरूप आर्थिक सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। पत्नी के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी को सिर्फ उसकी मामूली आय के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसी के आधार पर पति की तरफ से पेश किए गए संबंधी दावों को खारिज कर दिया।
पूरे मामले पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने मंडी फैमिली कोर्ट के आदेश को सही माना। अदालत ने पति की ओर से दाखिल याचिका को खारिज करते हुए पत्नी को हर महीने 10,000 रुपये गुजारा भत्ता देने के आदेश को बरकरार रखा।
हिमाचल हाईकोर्ट ने-