Tuesday, July 23, 2024
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सुक्खू सरकार नहीं देगी अनुबंध पर नौकरी, कॉन्ट्रैक्ट पॉलिसी खत्म करने की तैयारी

शिमला। हिमाचल प्रदेश में अब राज्य सरकार अनुबंध पर नौकरी की नीति को खत्म करने की तैयारी में है। हाई कोर्ट में कॉन्ट्रैक्ट पॉलिसी को डिफेंड ना करने के कारण राज्य सरकार ने इस नीति के को खत्म करने का फैसला लिया है। राज्य सचिवालय में मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना ने इसके विकल्प के तौर पर एक नई नीति का ड्राफ्ट बनाने के भी निर्देश दिए हैं। राज्य सचिवालय में गुरुवार को मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना की अगुवाई में सीओएस की एक अहम बैठक हुई।

इस बैठक में अनुंबध नीति पर नौकरी को खत्म करने की प्रक्रिया और इसके फायदे और नुकसान को लेकर काफी चर्चा की गई। इस बैठक में फाइनांस, पर्सनल और अन्य संबंधित मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया गया। इसके अलावा कमेटी ऑफ सेक्रेटरीज की बैठक में हाई कोर्ट से अनुबंध सेवाकाल को भी पेंशन के लिए गिनने के लिए लगातार आ रहे आदेशों को लेकर चर्चा की गई।

कोर्ट के ना काटने पड़े चक्कर

प्रबोध सक्सेना ने अनुबंध नीति के विकल्प में एक नई नीति तैयार करने के भी आदेश दिए। बैठक में ऐसी नई नीति लाने की चर्चा की गई, जिससे सरकारी खजाने पर ज्यादा बोझ ना पड़े, ना ही नियमित नियुक्ति देनी पड़े और कोर्ट के चक्कर भी ना काटने पड़े।

इस नई नीति उन्होंने नेशनल हेल्थ मिशन के आउटसोर्स मॉडल को अपनाने के निर्देश दिए। इस नई नीति को वित्त और कार्मिक विभाग मिलकर पॉलिसी का ड्रॉफ्ट तैयार करेंगे। फिर राज्य सरकार आदर्श चुनाव आचार संहिता खत्म होने के बाद कैबिनेट इस नए ड्राफ्ट पर अंतिम फैसला लेगी।

नहीं दिख रहा कोई फायदा

बता दें कि राज्य सरकार के मुख्य सचिव ने आयुष विभाग के बहुचर्चित शीला देवी बनाम प्रदेश सरकार के मामले वाले निर्णय को लागू करने के लिए वित्त सचिव की अगुवाई में पहले ही कमेटी का गठन किया हुआ है।

जिसमें अनुबंध अवधि को पेंशन के लिए गिना जा रहा है। जिसके चलते नागरिक आपूर्ति विभाग में ताज महोम्मद बनाम हिमाचल सरकार केस में भी अनुबंध अवधि को सीनियोरिटी और वित्तीय लाभों के लिए भी गिना जाएगा।

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गौरतलब है कि पहले अनुबंध सेवाकाल आठ साल का होता था जो कि अब दो साल का रहा गया है। राज्य सरकार ने अनुबंध नीति को लाया था कि सरकारी खजाने पर बोझ कम पड़ेगा। मगर कर्मचारी अनुबंध सेवाकाल को सीनियोरिटी के लिए काउंट और अन्य वित्तीय लाभ के लिए अदातल में ले जाते हैं और कोर्ट के फैसले भी उनके पक्ष में आते हैं। ऐसे में राज्य सरकार को इस नीति को जारी रखने में कोई लाभ नहीं दिख रहा है।

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