शिमला। हिमाचल प्रदेश में नौकरी की तलाश अब सिर्फ एक प्रयास नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा बनती जा रही है। लाखों युवा रोजगार के लिए पंजीकृत हैं, परीक्षाओं और भर्तियों का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है और कई परिवारों में भविष्य को लेकर चिंता गहराती दिख रही है। ऐसे माहौल में जब प्रदेश आर्थिक तंगी से गुजर रहा है, तब सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

 

RDG बंद, लेकिन खर्चों पर नहीं लगी रोक


केंद्र सरकार की ओर से राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद किए जाने के बाद हिमाचल की वित्तीय स्थिति और दबाव में आ गई है। सरकार खुद मान रही है कि आर्थिक हालात चुनौतीपूर्ण हैं। वित्त विभाग रिक्त पदों को समाप्त करने और नई भर्तियों पर रोक की सिफारिश कर चुका है। बावजूद इसके, सेवानिवृत्त अधिकारियों को दोबारा नियुक्त करने की परंपरा जारी है।

 

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बेरोजगार युवा बनाम पुनर्नियुक्त अधिकारी


प्रदेश में छह लाख से अधिक युवा बेरोजगार पंजीकृत बताए जा रहे हैं। दूसरी ओर, कई सेवानिवृत्त आईएएस और एचएएस अधिकारियों को पुनर्रोजगार या सेवा विस्तार दिया गया है। इन अधिकारियों को न सिर्फ मोटी तनख्वाह मिल रही है, बल्कि सरकारी आवास, वाहन और स्टाफ जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं। कुछ मामलों में अधिकारी वेतन के साथ पेंशन भी प्राप्त कर रहे हैं।

 

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सेवा विस्तार पर उठते सवाल


जिन अधिकारियों को सेवा विस्तार दिया गया है, उन्हें नियमित अधिकारियों के समान वेतन और अन्य लाभ मिल रहे हैं। बताया जा रहा है कि एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को डेढ़ लाख से ढाई लाख रुपये तक मासिक पगार और भत्ते दिए जा रहे हैं। ऐसे समय में जब सरकार खर्च घटाने की बात कर रही है, यह व्यवस्था आलोचना के केंद्र में है।

 

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घाटे में बोर्ड, फिर भी वही व्यवस्था


जिस बिजली बोर्ड में पहले भी सेवानिवृत्त मुख्य सचिवों और वरिष्ठ अफसरों को शीर्ष पदों पर बैठाया जाता रहा है, उसे अब घाटे से उबारने के लिए निजी हाथों में देने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वित्तीय संकट के दौर में पुरानी रिवायतों पर पुनर्विचार जरूरी है।

 

सरकार के भीतर से भी उठी आवाजें


सरकार के कुछ मंत्रियों और विपक्षी नेताओं ने भी खर्चों पर नियंत्रण की बात कही है। आयुष एवं खेल मंत्री ने माना है कि आरडीजी बंद होने के बाद हिमाचल को आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ेगी और बड़े पदों पर सेवानिवृत्त अधिकारियों की तैनाती पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि एक ओर बेरोजगार युवा सड़कों पर हैं, दूसरी ओर सलाहकारों और पुनर्नियुक्त अफसरों पर खर्च लगातार बढ़ रहा है।

 

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पूर्व अफसरों की भी अलग राय


कुछ सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि सरकार को पहले अपने खर्चे कम करने होंगे। नई योजनाएं घोषित तो होती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका असर सीमित रह जाता है। राजस्व बढ़ाने और केंद्र के सामने पहाड़ी राज्यों के हित मजबूती से रखने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।

 

सरकार का पक्ष


मुख्य सचिव ने कहा है कि राज्य सरकार वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए लगातार मंथन कर रही है। खर्च घटाने और आय के नए स्रोत तलाशने को लेकर बैठकों का दौर जारी है और हर पहलू पर विचार किया जा रहा है।

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